रणबांकुरे शूरवीरों की `धोरां री धरती' राजस्थान का गौरवशाली इतिहास

itihas1इतिहास जिससे हम अतीत के बारे में जानते हैं और ऐसा भी कहा जाता है कि इतिहास मनुष्य की प्रगति का स्वर्णिम महाकाव्य है। इतिहास संकीर्णता और नियतिवाद का शत्रु है तथा राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीहयता की भावना के पोषण में सहायक है। राजस्थान की संस्कृति एक विराट संस्कृति है। लोक का आलोक लिए इस प्रदेश के गौरवशाली अतीत में समृद़्ध परंपराएं पनपती रही हैं।राजस्थान का इतिहास तथा सभ्यता सिंधु घाटी जितनी ही प्राचीन है। ऋग्वेद के अनुसार राजस्थान में कभी सरस्वती नदी बहा करती थी। राजस्थान की उत्पत्ति के बारे में ऐसी मान्यता है कि त्रेतायुग में सीताहरण से क्षुब्ध भगवान श्रीराम ने जब लंका को ध्वस्त करने के लिए धनुष उठाया, तो उनकी अचूक शक्ति से परिचित देवताओं ने सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए उनसे तीर न चलाने का अनुरोध किया, किंतु तीर तो कमान में चढ़ चुका था और उसे वापिस लाना असंभव था। अत: भगवान श्री राम ने सागर को लक्षित कर उस तीर को छोड़ दिया और उस बाण की गर्मी से समुद्र गर्म होकर मरुभूमि में परिवर्तित हो गया। यही थार का मरुस्थल आज रेगिस्तान के रूप में जाना जाता है। 5000 ई. पूर्व राजस्थान का इतिहास आरंभ होता है। उस दौरान कालीबंगा सभ्यता का जन्म हुआ और भौगोलिक तथ्यों के आधार पर ऐसा कहा जाता है कि लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी के तट पर इस सभ्यता के नगर बसे हुए हैं। वाफणकर के अनुसार सरस्वती नदी लुप्त होने से पहले नागौर, लूनासर, डीडवाना होते हुए लूणी पर मिलती थी। महाभारत काल में कौरवों और पांडवों का युद्ध भी इसी तट पर लड़ा गया था। कालीबंगा सभ्यता के बाद आहड़ सभ्यता का जन्म हुआ जैसे कि कई जगह खुदाई से पता चला है। उसके बाद जनपद युग और गुप्तवंश यहां पर आये तथा गुप्तवंश ने लंबे समय तक शासन किया। 6वीं तथा 7वीं शताब्दी में हूणों ने आक्रमण किया तथा हूणों और गुर्जरों ने अपना शासन स्थापित किया, हालांकि हूणों ने यहां भयंकर आक्रमण कर बड़ी क्षति पहुंचायी। मालवा के यशोवर्मन ने हूणों को परास्त करने में सफलता प्राप्त की। उस दौरान इस भाग में केंद्रीय शक्ति न के बराबर थी और बिखरी हुई थी। लगभग इसी समय उत्तरी भारत में हर्षवर्धन का उदय हुआ। उसके शासन में राजस्थान में व्यवस्था और शांति की लहर आयी, परंतु जो बिखरी हुई अवस्था यहां पैदा हो गयी थी, वह सुधर नहीं सकी। इन राजनीतिक उथल-पुथल के संदर्भ में यहां के समाज में एक परिवर्तन दिखायी देता है। राजस्थान में दूसरी सदी ईसा पूर्व से छठीं सदी तक विदेशी जातियां आती रहीं और यहां के स्थानीय समूह उनका मुकाबला करते रहे, परंतु कालांतर में इन विदेशी आक्रमणकारियों की पराजय हुई। इनमें कई मारे गये और कई यहां बस गये। जो शाक या हूण यहां बचे रहे, उनका यहां की शास्त्रोपजीवी जातियों के साथ निकट संपर्क स्थापित होता गया और छठीं शताब्दी तक स्थानीय और विदेशी योद्धाओं का भेद जाता रहा।

इसके बाद राजपूतों की उत्पत्ति हुई। चंदबरदाई के प्रसिद्ध ग्रंथ `पृथ्वीराजरासो' के अनुसार राजपूतों को अग्निवंशीय बताया गया है। इसके अनुसार राजपूतों के चार वंश-प्रतिहार, परमार, चालुक्य itihas2और चौहान वशिष्ठ के यज्ञ कुंड से राक्षसों के संहार के लिए उत्पन्न किये गये थे। इसका प्रचार 16वीं तथा 18वीं सदी तक भाटों के जरिये होता रहा, हालांकि इस पर विश्वास करना कठिन होता है। इतिहासकारों ने भी इसे निराधार बताया। राजपूतों के दो वंश चंद्रवंश और सूर्यवंश हैं, जिनके आधार पर राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं और राजपूतों की उत्पत्ति में यही मत सर्वाधिक लोकप्रिय है। राजपूत काल में जिन्होंने राजस्थान में अपने-अपने राज्य स्थापित किये थे, उनमें मेवाड़ के गुहिल, मारवाड़ के गुर्जर, प्रतिहार, राठौड़, सांभर के चौहान तथा आबू के परमार, आंबेर के कछवाहा, जैसलमेर के भाटी आदि प्रमुख थे।

इस वंश का आदिपुरुष गुहिल था। इस कारण इस वंश के राजपूतों ने स्वयं को गुहिलवंशीय कहा। अल्लट जिसे ख्यातों में आलुरावल कहा गया है 10वीं सदी के लगभग मेवाड़ का शासक बना। उसने हूण राजकुमारी हरियादेवी से विवाह किया था तथा उसके समय में आहड़ में वराह मंदिर का निर्माण कराया गया। आहड़ से पूर्व गुहिल वंश की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र नागदा है। गुहिलों ने तेरहवीं सदी के प्रारंभिक काल तक मेवाड़ में कई उथल-पुथल के बावजूद भी अपने कुल के परंपरागत राज्य को बनाये रखा। मारवाड़ के गुर्जर प्रतिहारों की ओर से अपने राज्य की स्थापना सर्वप्रथम राजस्थान में की गयी थी। जोधपुर के शिलालेखों में ऐसा प्रमा णित होता है कि प्रतिहारों का अधिवासन मारवाड़ में लगभग छठीं शताब्दी के द्वितीय चरण में हो चुका था। चूंकि उस समय राजस्थान का यह भाग गर्जरत्रा कहलाता था इसलिए चीनी यात्री युवान च्वांग ने गुर्जर राज्य की राजधानी का नाम पीलो मोलो या बाड़मेर बताया है। अपने काल में मंडौर के प्रतिहारों ने सांस्कृतिक परंपरा को निभाकर अपने उदात्त स्वातंत्र्य प्रेम और शौर्य से उज्ज्वल कीर्ति को अर्जित किया। परमार शब्द का अर्थ शत्रु को मारनेवाला होता है। प्रारंभ में परमार आबू के आस-पास के प्रदेशों में रहते थे, परंतु प्रतिहारों की शक्ति के खत्म होने के साथ ही परमारों का राजनीतिक प्रभाव बढ़ता चला गया। धीरे-धीरे इन्होंने मारवाड़, सिंध, गुजरात, वागड़, मालवा आदि स्थानों में अपने राज्य स्थापित कर लिये। आबू के परमारों का कुल पुरुष धूमराज था, परंतु परमारों की वंशावली उत्पलराज से आरंभ होती है। परमार शासक धंधुक के समय गुजरात के भीमदेव ने आबू को जीतकर वहां विमल शाह को दंडपति नियुक्त किया। विमल शाह ने आबू में 1031 में आदिनाथ itihas3का भव्य मंदिर बनवाया था। वस्तुपाल के छोटे भाई तेजपाल ने आबू के देलवाड़ा गांव में लूणवसही नामक नेमिनाथ मंदिर का निर्माण करवाया तथा मालवा के भोज परमार ने चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर बनवाकर कला के प्रति अपनी रुचि को व्यक्त किया। सांभर के चौहानों के मूल स्थानों के संबंध में मान्यता है कि वे सपालदक्ष और जांगल प्रदेश के आस पास रहते थे। उनकी राजधानी अहिच्छत्रपुर (नागौर) थी। सपालदक्ष के चौहानों का आदि पुरुष वासुदेव था, जिसका समय 551 ई. के लगभग अनुमानित है। बिजौलिया प्रशस्ति में वासुदेव को सांभर झील का निर्माता माना गया है। प्रारंभ में चौहान प्रतिहारों के सामंत थे। इसी वंश के चंदराज की पत्नी रुद्राणी यौगिक क्रिया में निपुण थी। ऐसा माना जाता है कि वह पुष्कर झील में प्रतिदिन एक हजार दीपक जलाकर महादेव की उपासना करती थी।

1. 1113 ई. में अजयराज चौहान ने अजमेर नगर की स्थापना की। उसके पुत्र अर्णोराज ने अजमेर में आना सागर झील का निर्माण करवाकर जनोपयोगी कार्यों में भूमिका अदा की। चौहान शासक विग्रहराज चतुर्थ का काल सपालदक्ष का स्वर्ण युग कहलाता है। विग्रहराज को वीसलदेव और कवि बांधव भी कहा जाता था। उन्होंने `हरकेलि' नाटक और उसके दरबारी विद्वान सोमदेव ने `ललित विग्रहराज' नामक नाटक की रचना करके साहित्य स्तर को ऊंचा उठाया। विग्रहराज ने अजमेर में एक संस्कृत पाठशाला का निर्माण करवाया। यहीं आगे फिर कुतुबुद्दीन ऐबक ने `ढाई दिन का झोपड़ा' बनवाया। विग्रहराज चतुर्थ एक विजेता था। उसने तोमरों को पराजित कर ढिल्लिका (दिल्ली) को जीता। इसी वंशक्रम में पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने राजस्थान और उत्तरी भारत की राजनीति में अपनी विजयों से एक विशिष्ट स्थान बना लिया था। उसने चंदेल शासक परमार्दीदेव के देशभक्त सेनानी आल्हा और ऊदल को मारकर 1182 में महोबा को जीत लिया। कन्नौज के गाहड़वाल शासक जयचंद का दिल्ली को लेकर चौहानों से वैमनस्य था। `पृथ्वीराजरासो' दोनों के मध्य शत्रुता का कारण जयचंद की पुत्री संयोगिता को बताता है। 1191 ई. में पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने तराइन के प्रथम युद्ध में मुहम्मद गौरी को परास्त कर वीरता का समुचित परिचय दिया, परंतु 1192 ई. में तराइन के दूसरे युद्ध में जब पृथ्वीराज चौहान गौरी से हार गया, तो उसने आत्म-सम्मान को ध्यान में रखते हुए आश्रित शासक बनने की अपेक्षा मृत्यु को प्राथमिकता दी। इस हार के कारण राजपूतों का परंपरागत सैन्य संगठन कमज़ोर हो गया ऐसा माना जाता है। पृथ्वीराज चौहान अपने राज्यकाल के आरंभ से लेकर अंत तक युद्ध लड़ता रहा, जो उसके एक अच्छे सैनिक और सेनाध्यक्ष होने को प्रमाणित करता है। सिवाय तराइन के द्वितीय युद्ध के वह सभी युद्ध में विजेता रहा। itihas4
वह स्वयं अच्छा गुणी होने के साथ-साथ गुणीजनों का सम्मान करनेवाला था। जयानक विद्यापति गौड़ वागीश्वर, जनार्दन तथा विश्वरूप उसके दरबारी लेखक और कवि थे, जिनकी कृतियां उसके समय को अमर बनाये हुए हैं। जयानक ने `पृथ्वीराज विजय' की रचना की थी। `पृथ्वीराजरासो' का लेखक चंदबरदाई भी पृथ्वीराज चौहान का आश्रित कवि था, परंतु इसका यह अर्थ नहीं था कि इस युद्ध के बाद चौहानों की शिक्त समाप्त हो गयी। इसके बाद भी लगभग एक शताब्दी तक चौहानों की शाखाएं रणथंभौर, जालौर, हाड़ौती, नडौल तथा चंद्रावती और आबू में शासन करती रहीं और राजपूत शक्ति की धुरी बनी रहीं। राणा कुंभा तथा राणा सांगा के नेतृत्व में सर्वोच्चता की स्थापना राजपूताने में ही संभव हो सकती थी। यह स्मरण रहे कि आगे चलकर राणा प्रताप, चंद्रसेन और राजसिंह ने मुगलों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखा। यद्यपि अकबर की राजपूत नीति के कारण राजपूताना के अधिकांश शासक उसके हितों की रक्षा करनेवाले बन गये।

मध्यकालीन राजस्थान को बौद्धिक अधिसृष्टि से पिछड़ा मानना इतिहास के तथ्यों और अनुभवों के विपरीत होगा। जिस वीर प्रसूता वसुंधरा पर माघ, हरिभद्रसूरी, चंदबरदाई, सूर्यमल्ल मिश्रण, कवि करणीदास, दुरया आढ़ा नैणासी जैसे विद्वान लेखक तथा महाराणा कुंभा, राजा रायसिंह, राजा सवाई जयसिंह जैसे प्रबुद्ध शासक अवतरित हुए तथा जिस प्रदेश के रणबांकुरों में राणा प्रताप, राव चंद्रसेन, दुर्गादास जैसे व्यिक्तत्व रहे हों, वह धरती यश से वंचित रहे, सोचा भी नहीं जा सकता।
itihas6मेवाड़ के इतिहास में तेरहवीं शताब्दी के आरंभ में एक नया मोड़ आता है, जिसमें चौहानों की केंद्रीय शिक्त का ह्रास होना और गुहिल जैत्रसिंह जैसे व्यिक्त का शासक होना बड़े महत्त्व की घटनाएं हैं। मेवाड़ के गुहिल शासक रत्नसिंह (1302-03) के समय चित्तौड़ पर दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण किया था। अलाउद्दीन के इस आक्रमण के राजनीतिक, आर्थिक और सैनिक कारणों के साथ रत्नसिंह की सुंदर पत्नी पद्मिनी को प्राप्त करने की लालसा भी बताया जाता है। पद्मिनी कथा का उल्लेख मलिक मुहम्मद जायसी के `पद्मावत' नामक ग्रंथ में मिलता है। अलाउद्दीन के आक्रमण के दौरान रत्नसिंह और गौरा बादल वीर गति को प्राप्त हुए तथा पद्मिनी ने 1600 स्त्रियों के साथ जौहर कर आत्मोत्सर्ग किया। इसी समय अलाउद्दीन ने 30,000 हिंदुओं का चित्तौड़गढ़ में कत्ल करवा दिया था। आज भी चित्तौड़ के खंडहरों में गौरा बादल के महल उनके साहस और सूझबूझ की कहानी सुना रहे हैं। पद्मिनी का त्याग और जौहर व्रत महिलाओं को एक नयी प्रेरणा देता है। गौरा बादल का बलिदान हमें यह सिखाता है कि जब देश पर आपत्ति आये, तो अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देश रक्षा में लग जाना चाहिये।

रत्नसिंह के बाद सिसोदिया के सरदार हम्मीर ने मेवाड़ को दयनीय स्थिति से उबारा। वह राणा लाखा का राजपूत था। राणा लाखा (1382-1421) के समय उदयपुर की पिछोला झील का बांध बनवाया गया था। लाखा के निर्माण कार्य मेवाड़ की आर्थिंक स्थिति तथा संपन्नता को बढ़ाने में उपयोगी सिद्ध हुए। मोकल के पुत्र राणा कुंभा (1433-1468) का काल मेवाड़ में राजनीतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक उन्नति के लिए जाना जाता है।
मेवाड़ के वीरों में राणा सांगा (1509-1528) का अद्वितीय स्थान है। सांगा ने गागरोन के युद्ध में मालवा के महमूद खिलजी द्वितीय और खातौली के युद्ध में दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी को itihas7पराजित कर अपनी सैनिक योग्यता का परिचय दिया। सांगा भारतीय इतिहास में हिंदूपत के नाम से विख्यात है। राणा सांगा खानवा के मैदान में राजपूतों का एक संघ बनाकर बाबर के विरुद्ध लड़ने आया था, परंतु पराजित हुआ। बाबर के श्रेष्ठ नेतृत्व तथा तोपखाने के कारण सांगा की पराजय हुई। इससे राजसत्ता राजपूतों के हाथों से निकलकर मुगलों के हाथों में आ गयी। यहीं से उत्तरी भारत का राजनीतिक संबंध मध्य एशियाई देशों से पुन: स्थापित हो गया। राणा सांगा अंतिम हिंदू राजा था, जिसके सेनापतित्व में सब राजपूत जातियां विदेशियों को भारत से निकालने के लिए सम्मिलित हुइंर्। सांगा के पुत्र विक्रमादित्य के राज काल में गुजरात के बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर दो आक्रमण किये, जिसमें मेवाड़ को जन और धन की हानि उठानी पड़ी। इसके आक्रमण के दौरान विक्रमादित्य की मां और सांगा की पत्नी हाड़ी कर्मावती ने हुमायूं के पास राखी भेजकर सहायता मांगी, दूसरी ओर समय पर सहायता न मिलने पर कर्मावती ने जौहर व्रत का पालन किया। परंतु पन्नाधाय ने अपने पुत्र चंदन को मृत्यु शैय्या पर लिटाकर उदयसिंह को बचा लिया और चित्तौड़गढ़ से निकालकर कुंभलगढ़ पहुंचा दिया। इस प्रकार पन्नाधाय ने देश प्रेम के प्रति त्याग का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया, जिसका गान भारतीय इतिहास में सदियों तक होता रहेगा।

itihas8महाराणा उदयसिंह ने 1559 में उदयपुर की स्थापना की थी। उसके समय में अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया था, परंतु कहा जाता है कि अपने मंत्रियों की सलाह पर उदयसिंह चित्तौड़ की रक्षा का भार जयमल मेडतिया और फत्ता सिसोदिया को सौंपकर गिरवा की पहाड़ियों में चला गया था। इतिहास लेखकों ने इसे उदयसिंह की कायरता बताया है। अकबर से लड़ते हुए जयमल और फत्ता वीर गति को प्राप्त हुए। अकबर ने चित्तौड़ में तीन दिनों के कठिन संघर्ष के बाद 25 फरवरी, 1568 को किला फतह कर लिया। अकबर की ओर से कराये गये नरसंहार से आज भी उसका नाम कलंकित है। अकबर जयमल और फत्ता की वीरता से इतना मुग्ध हुआ कि उसने आगरा किले के द्वार पर उन दोनों वीरों की पाषाण मूर्तियां बनवाकर लगवा दीं।
उदयसिंह के पुत्र महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 को कटारगढ़ (कुंभलगढ़) में हुआ था। प्रताप ने मेवाड़ के सिंहासन पर कुल पच्चीस वर्षों तक शासन किया, लेकिन इतने समय में ही उन्होंने ऐसी कीर्ति अर्जित की, जो देश काल की सीमा को पार कर अमर हो गयी। वह और उनका मेवाड़ राज्य वीरता, बलिदान और देश अभिमान के पर्याय बन गये। प्रताप को पहाड़ी भाग में `कीका' कहा जाता था, जो स्थानीय भाषा में छोटे बच्चे का सूचक है। अकबर ने प्रताप को अधीनता में लाने के अनेक प्रयास किये, परंतु निष्फल रहे। जहां भारत के तथा राजस्थान के अधिकांश नरेशों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी, प्रताप ने वैभव के प्रलोभन को ठुकरा कर राजनीतिक मंच पर अपनी कर्तव्य परायणता के उत्तरदायित्त्व को बड़े साहस से निभाया। उसने अपनी निष्ठा और ढृ़ढता से अपने सैनिकों को कर्तव्य-बोध, प्रजा को आशावादी और शत्रु को भयभीत रखा।itihas9

अकबर मेवाड़ की स्वतंत्रता समाप्त करने और महाराणा प्रताप उसकी रक्षा के लिए जुटे हुए थे। दोनों की मनोवृत्ति और भावनाओं का मेल न होना ही हल्दी घाटी के युद्ध का कारण बन गया। अकबर के प्रतिनिधि मानसिंह और महाराणा प्रताप के मध्य ऐतिहासिक हल्दी घाटी का युद्ध लड़ा गया, परंतु इसमें मानसिंह प्रताप को मारने अथवा बंदी बनाने में असफल रहा। वहीं प्रताप ने अपने प्रिय घोड़े चेतक की पीठ पर बैठकर मुगलों को ऐसा छकाया कि वे अपना पिंड छुड़ाकर मेवाड़ से भाग निकले। यदि हम इस युद्ध के परिणामों को गहराई से देखते हैं, तो पार्थिव विजय तो मुगलों को मिली, परंतु वह विजय पराजय से कोई कम नहीं थी। महाराणा प्रताप को विपत्ति काल में उसके मंत्री भामाशाह ने सुरक्षित संपत्ति लाकर समर्पित कर दी थी। इसीलिए भामाशाह को दानवीर तथा मेवाड़ का उद्धारक कहकर पुकारा जाता है। महाराणा प्रताप की मृत्यु के पश्चात् उसके पुत्र अमर सिंह ने मेवाड़ की बिगड़ी हुई व्यवस्था को सुधारने के लिए मुगलों से संधि करना श्रेयस्कर माना। मुगलों से संधि करनेवाला अमर सिंह मेवाड़ का प्रथम शासक था।

itihas10कछवाहा वंश राजस्थान के इतिहास मंच पर बारहवीं सदी से दिखायी देता है। उनको प्रारंभ में मीणों और बड़गुजरों का सामना करना पड़ा था। इस वंश के प्रारंभिक शासकों में दुल्हैराय तथा पृथ्वीराज बड़े प्रभावशाली थे, जिन्होंने दौसा, रामगढ़, झोटवाड़ा, गेटोर तथा आमेर को अपने राज्य में सम्मिलित किया था। पृथ्वीराज, राणा सांगा का सामंत होने के नाते खानवा के युद्ध में बाबर के विरुद्ध लड़ा था। पृथ्वीराज की मृत्यु के बाद कछवाहों की स्थिति संतोषजनक नहीं थी। गृह-कलह तथा अयोग्य शासकों से राज्य निर्बल हो रहा था। 1547 में भारमल ने आमेर की बागडोर हाथ में ली। भारमल ने उदीयमान अकबर की शक्ति का महत्त्व समझा और 1562 में उसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर अपनी ज्येष्ठ पुत्री हरतूबाई का विवाह अकबर के साथ कर दिया। अकबर की यह बेगम मरियम उज्जमानी के नाम से विख्यात हुई। भारमल पहला राजपूत था, जिसने मुसलमानों (मुगल) से वैवाहिक संबंध स्थापित किये थे।
भारमल के पश्चात कछवाहा शासक मानसिंह अकबर के दरबार का योग्य सेनानायक था। रणथंभौर के 1569 के आक्रमण के समय मानसिंह और उसके पिता भगवंत दास अकबर के साथ थे। वह अकबर के नवरत्नों में शामिल था। मानसिंह ने आमेर में शिलादेवी मंदिर, जगतशिरोमणि मंदिर इत्यादि का निर्माण करवाया। मानसिंह के बाद के शासकों में मिर्जा राजा जयसिंह महत्त्वपूर्ण था, जिसने 46 वर्षों तक शासन किया। इस दौरान उसे जहांगीर, शाहजहां और औरंगजेब की सेवा में रहने का अवसर प्राप्त हुआ। उसे शाहजहां ने मिऱ्जा राजा का खिताब प्रदान किया। औरंगजेब ने मिऱ्जा राजा जयसिंह को मराठों के विरुद्ध दक्षिण भारत में नियुक्त किया था। जयसिंह ने पुरंदर में शिवाजी को पराजित कर मुगलों से संधि के लिए बाध्य किया। 11 जून, 1665 को शिवाजी और जयसिंह के मध्य पुरंदर की संधि हुई, जो जयसिंह की राजनीतिक दूरदर्शिता का एक सफल परिणाम थी। जयसिंह के बनवाये आमेर के महल तथा जयगढ़ और औरंगाबाद में जयसिंहपुरा उसकी वास्तुकला के प्रति रुचि को प्रदर्शित करते हैं। itihas11

कछवाहा शासकों में सवाई जयसिंह द्वितीय का अद्वितीय स्थान था। वह राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ, खगोलविद्, विद्वान, साहित्यकार तथा कला का पारखी था। वह मालवा का मुगल सूबेदार रहा था। जयसिंह ने मुगल प्रतिनिधि के रूप में बदनसिंह के सहयोग से जाटों का दमन किया। सवाई जयसिंह ने राजपूताना में अपनी स्थिति मज़बूत करने तथा मराठों का मुकाबला करने के उद्देश्य से 17 जुलाई, 1734 को हुरड़ा (भीलवाड़ा) में राजपूत राजाओं का सम्मेलन आयोजित किया। इसमें जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कोटा, किशनगढ़, नागौर, बीकानेर आदि के शासकों ने भाग लिया था, परंतु इस सम्मेलन का जो परिणाम होना चाहिये था, वह नहीं हुआ, क्योंकि राजस्थान के शासकों के स्वार्थ भिन्न-भिन्न थे। सवाई जयसिंह अपना प्रभाव बढ़ाने के उद्देश्य से बूंदी के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर स्वयं वहां का सर्वेसर्वा बन बैठा, परंतु बूंदी के बुद्धसिंह की पत्नी अमर कुंवर ने जो जयसिंह की बहिन थी, मराठा मल्हारराव होल्कर को अपना राखीबंद भाई बनाकर और धन का लालच देकर बूंदी आमंत्रित किया, जिससे होल्कर और सिंधिया ने बूंदी पर आक्रमण कर दिया।

itihas12सवाई जयसिंह संस्कृत और फारसी का विद्वान होने के साथ गणित और खगोल शास्त्र का असाधारण पंडित था। उसने `जयसिंह कारिका' नामक ज्योतिष ग्रंथ की रचना की। सवाई जयसिंह की महान देन जयपुर है, जिसकी स्थापना उसने 1727 में की थी। जयपुर का वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य था। नगर निर्माण के लिहाज से यह नगर भारत तथा योरप में अपने ढंग का अनूठा है, जिसकी समकालीन और वर्तमानकालीन विदेशी यात्रियों ने प्रशंसा की। जयपुर में जयसिंह ने सुदर्शनगढ़ किले का निर्माण करवाया तथा जयगढ़ किले में जयबाण नामक तोप बनवायी। उसने दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा और बनारस में पांच वेधशालाओं (जंतर-मंतर) का निर्माण करवाया, जो ग्रह-नक्षत्र आदि की गति को सही तौर से जानने के लिए बनवायी गयी थीं। जयपुर के जंतर-मंतर में सवाई जयसिंह की ओर से निर्मित सूर्य घड़ी है, जिसे सम्राट यंत्र के नाम से जाना जाता है, जो दुनिया की सबसे बड़ी सूर्य घड़ी के रूप में प्रसिद्ध है। धर्मरक्षक होने के नाते उसने वाजपेय, राजसूय आदि यज्ञों का आयोजन किया। वह अंतिम हिंदू नरेश था, जिसने भारतीय परंपरा के अनुकूल अश्वमेघ यज्ञ किया। इस प्रकार सवाई जयसिंह अपने शौर्य बल, कूटनीति और विद्वता के कारण अपने समय का ख्याति प्राप्त व्यक्ति बन गया था, परंतु वह युग के प्रचलित दायरे से ऊपर न उठ सका।itihas13

राजस्थान के उत्तरी और पश्चिमी भागों में राठौड़ राज्य स्थापित था। इनमें जोधपुर और बीकानेर के राठौड़ राजपूत प्रसिद्ध रहे हैं। जोधपुर राज्य का मूल पुरुष राव सीहा था, जिसने मारवाड़ के छोटे भाग पर शासन किया, परंतु लंबे समय तक गुहिलों, परमारों, चौहानों आदि राजपूत राजवंशों की तुलना में राठौड़ों की शक्ति प्रभावशाली न हो पायी थी। राठौड़ शासक राव जोधा ने 1459 में जोधपुर बसाकर वहां मेहरानगढ़ का निर्माण कराया था। राव गंगा ने खानवा के युद्ध में 4,000 सैनिक भेजकर सांगा की मदद की थी। इस प्रकार सांगा जैसे शक्ति संपन्न शासक के साथ रहकर राव गंगा ने अपने राज्य का राजनीतिक स्तर ऊपर उठा दिया। राव मालदेव गंगा का ज्येष्ठ पुत्र था। वह अपने समय का एक वीर प्रतापी शक्ति संपन्न शासक था। उसके समय में मारवाड़ की सीमा हिंडौन, बयाना, फतेहपुर-सीकरी और मेवाड़ की सीमा तक प्रसारित हो चुकी थी। मालदेव की पत्नी उमादें (जैसलमेर की राजकुमारी) इतिहास में रूबी रानी के नाम से विख्यात हैं। मालदेव के साहेबा के मैदान में बीकानेर के राव जैतसी को मारकर अपने साम्राज्य विस्तार की इच्छा को पूरा किया, परंतु मालदेव ने अपनी विजयों से जैसलमेर, मेवाड़ और बीकानेर से शत्रुता बढ़ाकर अपने सहयोगियों की संख्या कम कर दी।

मालदेव के पुत्र चंद्रसेन ने जो एक स्वतंत्र प्रकृति का वीर था, अपना अधिकांश जीवन पहाड़ों में बिताया, परंतु अकबर की आजीवन अधीनता स्वीकार नहीं की। वंश गौरव और स्वाभिमान, जो राजस्थान की संस्कृति के मूल तत्व हैं, हम चंद्रसेन के व्यक्तित्त्व में पाते हैं। महाराणा प्रताप ने जैसे अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए मुगल अधीनता स्वीकार नहीं की, उसी प्रकार चंद्रसेन भी आजन्म अकबर से टक्कर लेता रहा। चंद्रसेन की मृत्यु के बाद अकबर ने चंद्रसेन के बड़े भाई राजा उदयसिंह को 1583 में मारवाड़ का राज्य सौंप दिया। इस प्रकार उदयसिंह मारवाड़ का प्रथम शासक था, जिसने मुगलों की कृपा प्राप्त की थी। उदयसिंह ने 1587 में अपनी पुत्री मानीबाई का विवाह जहांगीर के साथ कर दिया। इसी वंश के गजसिंह का पुत्र अमरसिंह राठौड़ राजकुमारों में अपने साहस और वीरता के लिए प्रसिद्ध है। आज भी इसके नाम के ख्याल राजस्थान के गांवों में गाये जाते हैं।

itihas14जसवंत सिंह वीर साहसी और कूटनीतिज्ञ था, उसी प्रकार विद्या तथा कला प्रेमी भी था। उसने `भाषा भूषण' नामक ग्रंथ लिखा। जसवंत सिंह मारवाड़ का शासक था, जिसने अपने बल और प्रभाव से अपने राज्य का सम्मान बनाये रखा। मुगल दरबार का सदस्य होते हुए भी उसने अपनी स्वतंत्र प्रकृति का परिचय देकर राठौड़ वंश के गौरव और पद की प्रतिष्ठा बनाये रखी। राठौड़ दुर्गादास ने औरंगजेब का विरोध कर जसवंत सिंह के पुत्र अजीत सिंह को मारवाड़ का शासक बनाया, परंतु अजीत सिंह ने अपने सहायक और मारवाड़ के रक्षक अदम्य साहसी वीर दुर्गादास को, जिसने उसके जन्म से ही उसका साथ दिया था, कुछ लोगों के बहकावे में आकर बिना किसी अपराध के मारवाड़ से निर्वासित कर दिया। यह घटना उसके चरित्र पर कलंक की कालिमा के रूप में सदैव अंकित रहेगी।

जोधपुर के जोधा के पुत्र राव बीका ने 1488 में बीकानेर बसाकर उसे राठौड़ सत्ता का दूसरा केंद्र बनाया। बीका के पुत्र राव लूणकर्ण को इतिहास में कलयुग का कर्ण कहा गया है। बीकानेर के जैतसी का बाबर के पुत्र कामरान से संघर्ष हुआ, जिसमें कामरान की पराजय हुई। 1570 में अकबर की ओर से आयोजित नागौर दरबार में राव कल्याणमल ने अपने पुत्र रायसिंह के साथ भाग लिया। तभी से मुगल सम्राट और बीकानेर राज्य का मैत्री संबंध स्थापित हो गया। बीकानेर के नरेशों में कल्याणमल प्रथम व्यक्ति था, जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली थी।
महाराजा रायसिंह ने मुगलों के लिए गुजरात, काबुल और कंधार अभियान किया। वह अपने वीर तथा स्वामी-भक्ति के गुणों के कारण अकबर तथा जहांगीर का विश्वासपात्र बना रहा। रायसिंह ने बीकानेर के किले का निर्माण करवाया, जिस पर मुगल प्रभाव दिखायी देते हैं। रायसिंह स्वभाव से उदार तथा दानवीर शासक थे। इसी आधार पर मुंशी देवीप्रसाद ने उन्हें राजपूताना का कर्ण कहा है। महाराज अनूपसिंह वीर, कूटनीतिज्ञ और विद्यानुरागी शासक थे। उन्हें संगीत से प्रेम था। उन्होंने दक्षिण में रहते हुए अनेक ग्रंथों को नष्ट होने से बचाया और उन्हें खरीदकर अपने पुस्तकालय के लिए ले आये। कुंभा के संगीत ग्रंथों का पूरा संग्रह भी उन्होंने एकत्र करवाया था। आज अनूप पुस्तकालय (बीकानेर) हमारे लिए अलभ्य पुस्तकों का भंडार है, जिसका श्रेय अनूपसिंह के विद्यानुराग को है। दक्षिण में रहते हुए अनेक मूर्तियों का संग्रह किया और उन्हें नष्ट होने से बचाया। यह मूर्तियों का संग्रह बीकानेर के तैंतीस करोड़ देवताओं के मंदिर में सुरक्षित है।

जालौर की चौहान शाखा का संस्थापक कीर्तिपाल था। प्राचीन शिलालेखों में जालौर का नाम जाबालिपुर और किले का सवर्णगिरि मिलता है, जिसको अपभ्रंश मेंं सोनागढ़ कहते हैं। इसी पर्वत के itihas15नाम से चौहानों की यह शाखा सोनागया कहलायी। वर्तमान हाड़ौती क्षेत्र पर चौहान वंशीय हाड़ा राजपूतो का अधिकार था। प्राचीनकाल में इस क्षेत्र पर मीणाओं का अधिकार था। ऐसा माना जाता है कि बूंदा मीणा के नाम पर ही बूंदी का नामकरण हुआ। कुंभाकालीन राणपुर के लेख में बूंदी का नाम वृंदावती मिलता है। राव देवा ने मीणाओं को पराजित कर 1241 में बूंदी राज्य की स्थापना की थी। बूंदी के प्रसिद्ध किले का निर्माण बरसिंह हाड़ा ने करवाया था। तारागढ़ ऐतिहासिक काल में भित्तिचित्रों के लिए विख्यात रहा है। बूंदी के सुर्जनसिंह ने 1569 में अकबर की अधीनता स्वीकार की थी। बूंदी की प्रसिद्ध चौरासी खंभों की छतरी शत्रुसाल हाड़ा का स्मारक है, जो 1658 में शामूगढ़ के युद्ध में औरंगजेब के विरुद्ध शाही सेना की ओर से लड़ता हुआ मारा गया। बुद्धसिंह के शासन काल में मराठों ने बूंदी रियासतों पर आक्रमण किया था। प्रारंभ में कोटा बूंदी राज्य का ही भाग था, जिसे शाहजहां ने बूंदी से अलग कर मोधासिंह को सौंपकर 1631 ई. में नये राज्य के रूप में मान्यता दी थी। कोटा राज्य का दीवान झाला जालिमसिंह इतिहास चर्चित व्यक्ति रहा है। कोटा रियासत पर उसका पूर्ण नियंत्रण था। कोटा में ऐतिहासिक काल से आज तक कृष्ण शक्ति का प्रभाव रहा है। इसलिए कोटा का नाम नंदग्राम मिलता है। `धरती धोरां री' का इतिहास अपने आप में राजस्थान का ही नहीं, अपितु भारतीय इतिहास का उज्ज्वल तथा गौरवशाली पहलू है।

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