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बे-लगाम हुआ बेलगाम मुद्दा पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित Administrator   
मंगलवार, 20 जुलाई 2010 20:13

बेलगाम मुद्दा अपने नाम के मुताबिक ही समय-समय पर बे-लगाम होने लगता है। महाराष्ट्र और कर्नाटक दो राज्यों की सीमा पर बसे क़रीब 865 मराठीभाषी गांव जो कन्नड़ भाषी राज्य में हैं, दोनों ही राज्यों की नाक की बात बने हुए हैं। महाराष्ट्र के मराठी माणुस को कन्नड़ लोग सतायेंगे, तो राजनीति तो भड़केगी ही, लेकिन हर बार यह आग जलती है और फिर बुझ जाती है। सवाल उठता है कि इसका स्थायी समाधान क्यों नहीं ढूंढ़ा जाता? सच्चाई तो यह है कि हमारे जन-प्रतिनिधि कुछ मुद्दों को हमेशा ज़िंदा रखना चाहते हैं, ताकि समय आने पर अपने स्वार्थ की रोटी सेंकी जा सके। यह स्वार्थपरता सत्ता प्राप्ति की हिमायती है। अब तक बेलगाम को महाराष्ट्र में शामिल करने का मुद्दा था, लेकिन अब उसे केंद्र शासित करने की मांग की जा रही है।

बेलगाम को लेकर महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच जारी सीमा-विवाद ने तब और तल्ख रूप ले लिया, जब महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री अशोक चव्हाण ने कहा कि इस विवाद का उच्चतम न्यायालय में कोई समाधान होने तक कर्नाटक के मराठी भाषी 865 गांवों को केंद्र शासित घोषित कर देना चाहिये। इस निवेदन के साथ महाराष्ट्र का एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल मुख्य मंत्री अशोक चव्हाण की अगुवाई में नयी दिल्ली में प्रधान मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से मिला और उन्होंने उन्हें ज्ञापन भी सौंपा। यहां चव्हाण ने गुगली खेली और ज्ञापन में उन 865 गांवों को केंद्र शासित करने की बात कहीं नहीं लिखी, यानी मुख्य मंत्री का बयान जबानी था। उन्होंने सिर्फ कहा, किया नहीं।

इससे पहले महाराष्ट्र विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होने के पहले ही दिन विपक्ष ने जब बेलगाम का मुद्दा उठाया, तब मुख्यमंत्री ने विपक्ष की हां में हां मिलाते हुए बेलगाम को केंद्र शासित करने की बात कही और दूसरे ही दिन प्रधान मंत्री के सामने पलट गये। क्या करें, शायद वो भी विपक्ष का जोश देखकर बे-लगाम हो गये थे और बाद में संभल गये। सत्र के दूसरे दिन कर्नाटक में शामिल बेलगाम, कारवार, निपाणी, गुलबर्गा, बिदर और भालकी सहित 865 गांवों को महाराष्ट्र में शामिल करने के लिए विधानसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ। सदन में इस आशय का प्रस्ताव प्रतिपक्ष के नेता एकनाथ खड़से ने पेश किया था। उन्होंने कहा कि कर्नाटक में हर पार्टी की सरकार ने सीमावर्ती मराठी भाषी लोगों के साथ अन्याय किया है। इस मुद्दे पर शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने भी मांग की कि सीमा विवाद का मामला उच्चतम न्यायालय की सुनवाई पूरी होने तक निपाणी, बिदर और भालकी जैसे मराठी भाषी क्षेत्रों को केंद्र शासित घोषित कर दिया जाये। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की जाये। सत्ताधारियों पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि कर्नाटक राज्य में बसे मराठियों पर अत्याचार हो रहा है, जिसे केंद्र और राज्य सरकार नज़रअंदाज़ कर रही हैं। उद्धव ठाकरे का कहना है कि बेलगाम को महाराष्ट्र में शामिल करने का मुद्दा शिवसेना प्रमुख बाबासाहेब ठाकरे ने 1959 में उठाया था। तब से लेकर आज तक सरकार ने इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया। श्री ठाकरे का कहना है कि इस भू-भाग को केंद्र शासित करने में संविधान की समस्या आड़े नहीं आयेगी। दार्जिलिंग हिल काउंसिल की स्थापना कर वहां की जनता को अधिकार दिया गया है। इसी तरह इस समस्या को हल किया जा सकता है।

उद्धवजी ने अपना सुझाव दे दिया और चव्हाणजी ने अपना, लेकिन इस पर अमल कौन करेगा? बेलगाम मुद्दा इतने वर्षों से चला आ रहा है। इससे साफ ज़ाहिर होता है कि हमारे नेताओं की वैचारिकता में समानता का अभाव है। मराठी माणुस के मुद्दो को वोट बैंक की राजनीति में तब्दील कर दिया गया है। जब-जब चुनाव नजदीक आते हैं तब-तब बेलगाम मुद्दे को गड़े मुर्दे की तरह उखाड़ कर अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

बेलगाम का क्या करना चाहिये, इस पर वहां की जनता की राय क्यों नहीं ली जाती? क्या उन 865 गांवों के लोगों से पूछा गया कि वो क्या चाहते हैं? जनता की आवाज़ निश्चित ही समाधान निकालने के पक्ष में होगी। जिस तरह से वर्षों से बेलगाम मुद्दे को लटकाया जा रहा है, उसे देखते हुए इसके पीछे वोट बैंक की राजनीति दृष्टिगोचर हो रही है। बे-लगाम हो रहे इस बेलगाम मुद्दे को आखिर कब लगेगी लगाम?

अंतिम अद्यतन ( मंगलवार, 20 जुलाई 2010 20:16 )
 


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