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(ज़िंदगी की सबसे बड़ी ज़रूरत ``पानी'' पर) पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित कुंवर जावेद   

ख़र्च कम करके ज़्यादा जो बचाये पानी ।

उसकी आंखों में कभी फिर नहीं आये पानी ।।

एक-एक बूंद की क़ीमत वही जानेगा कै जो ।

अपने हाथों से कुंआ खोद के लाये पानी ।।

क़द्र कोई भी नहीं करता यहां पानी की ।

चाहते सब हैं किचन तक चला आये पानी ।।

हमने चेहरों का उतरता हुआ पानी देखा ।

जब ज़रूरत हो बहुत और न आये पानी ।।

दूर कर दे मेरी नदियों का खुदा सूनापन ।

खूब अंगड़ाइयां ले, शोर मचाये पानी ।।

चंद छीटों में छुपा होता है जीवन का बहाव ।

ये तभी तो हमें नींदों से जगाये पानी ।।

सख़्त हालात न पैदा करे पानी की कमी ।

एक दूजे के लहू से न नहाये पानी ।।

ये ही बदख़र्ची का आलम रहा तो फिर इक दिन ।

लोग चीख़ उठेंगे ये कहके कै हाये पानी ।।

वक़्त के रहते सुनो ! होश में आयें हम सब ।

इससे पहले कै हमें पानी, पिलाये पानी

तीसरी जंग इसी पानी के लिये होनी है ।

खुदा दुनिया को वह दिन न दिखाये पानी ।।

                                                                        

अंतिम अद्यतन ( गुरुवार, 08 जुलाई 2010 13:30 )
 

Sarovar Portico

श्री नंद किशोर नौटियाल जी

 

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