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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आंदोलन के लक्ष्य ? पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
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अपनी जन्म तिथि २८ दिसंबर, १८८५ से लेकर भारत की स्वाधीनता के पर्व १५ अगस्त, १९४७ तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतवर्ष के सबसे बड़े प्रमुख राजनीतिक संगठन के रूप में उभरा, जिसने समाज सुधार के साथ ही भारत की संस्कृति के तक़ाज़ों, स्वतंत्रता की अनिवार्यता के प्रति जागरूकता पैदा की और इनके लिए जन-आंदोलन किया। यह स्वाभाविक ही था कि जिस दौर में कांग्रेस का जन्म हुआ वह विश्व में जनजागरण का युग था। ब्रिटेन में पार्लमेंटरी प्रणाली प्रारंभ हो चुकी थी। विदेशों में वहां के बुद्धिजीवी भारत की आज़ादी के समर्थन में आने लगे थे। और इसी दौर में कांग्रेस का गठन ब्रिटिश राज्य के वरिष्ठ अधिकारी एओ ह्यूम ने इस उद्देश्य के साथ किया था कि पढ़े-लिखे सुसंस्कृत भारतीयों का एक ऐसा संगठन बनाया जाये जो ब्रिटिश राज के साथ मिलकर एक मज़बूत उपनिवेश (डोमीनियन) की स्थापना करने में सहायक हो।

ग़रज़ यह कि भारतीयों के साथ मिलकर बर्तानवी संस्कृति, बर्तानवी राजनीतिक सोच का वैसा प्रसार हो जैसा आस्ट्रेलिया या कनाडा में हुआ। तब इस संगठन में भारत के आम अनपढ़ ग़ैर अंगरेज़ीदां गरीब आदमी की कोई जगह नहीं थी, लेकिन उस समय ह्यूम ने कलकत्ता, बॉम्बे, मद्रास के गिनेचुने पढ़े-लिखे ७५ व्यक्तियों को लेकर इस संगठन का गठन किया। इसके लिए मई १८८५ में तत्कालीन वायसराय की स्वीकृति भी ले ली गयी थी। फिर भी इस संगठन में हिंदुस्तानी शामिल हुए। उन्होंने ह्यूम को इस्तेमाल करके राष्ट्रीय उद्देश्य की पूर्ति के लिए इसे एक सुनहरा अवसर समझा, जो इस तथ्य से साबित होता है कि उत्तरोत्तर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस स्वराज के आंदोलन का एक शक्तिशाली अस्त्र बन गया। प्रथम अध्यक्ष वोमेश चंद्र बनर्जी हुए बाकी सभी सदस्यों में हिंदू अधिक थे। मुसलमानों के नाम पर एक भी सदस्य कार्यकारिणी में पदाधिकारी नहीं बनाया गया। प्रमुख शिक्षाविद सर सैयद अहमद खान, मुस्लिम धार्मिक नेताओं तथा हिंदू संगठनों ने कांग्रेस के गठन का पुरज़ोर विरोध तो किया, लेकिन अलग से आज़ादी के लिए कोई आंदोलन भी खड़ा नहीं किया।

२०वीं शताब्दी के प्रारंभ से कुछ समय पहले ही लोकमान्य तिलक ने `स्वराज' की कल्पना का बीज बो कर भारतीयों की आशाओं को उभारा और हुकूमत में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित किया। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के सदस्य क़ानून बनाने की प्रक्रिया से जुड़ने के रास्ते ढूंढ़ने में लगे। ब्रिटिश प्रशासन में सहयोग करके पदों को हासिल करने की मुहिम शुरू हुई। दादा भाई नौरोजी, हाऊस ऑफ कॉमन के सदस्य चुने गये, मोहम्मद अली जिन्ना के मन में हुकूमत में हिस्सा प्राप्त करने का बीज प्रस्थापित हुआ।

बाल गंगाधर तिलक के ``स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है'' की कल्पना, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय के हिंदू प्रेम से उत्पन्न ``राजनीतिक राष्ट्रीय विचार'' ने महाराष्ट्र, पंजाब, बंगाल में नयी हवा पैदा की, परंतु गोखले, फिरोज़शाह मेहता ने तिलक की आलोचना करके उन्हें और उनके समर्थकों को अलग से संगठन बनाने पर मजबूर कर दिया। तभी ब्रिटिश हुकूमत ने ख़तरा समझ तिलक को जेल में डाल दिया। मुसलमानों ने आल इंडिया मुस्लिम लीग का गठन कर स्वयं को कांग्रेस की मुख्यधारा से दूर कर लिया।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारत में एक बार फिर आज़ादी की चिंगारी उठी। कांग्रेस फिर पुनर्गठित हुई। १९१६ में लखनऊ अधिवेशन में तिलक, गोखले फिर एक साथ हुए। फिर से मोहम्मद अली जिन्ना साथ आ गये। १९१७ में कांग्रेस अध्यक्ष एनी बेसेंट के साथ सभी ने मिलकर ब्रिटिश भारतीय राज शासन में भारतवासियों की सहभागिता की मांग पर जोर दिया।

इसे समय का प्रभाव कहा जाये या नियति का खेल, उन्हीं दिनों १९१६ में मोहनदास करमचंद गांधी का भारतीय राजनीतिक पटल पर अवतरण हुआ। गांधीजी ने कांग्रेस के मूल्यों, आदर्शों और उद्देश्यों को भारतीय संस्कृति, इतिहास, रहन-सहन और आस्थाओं की नीति पर रचकर एक नये आंदोलन को रूपायित किया। एक नयी विश्वदृष्टि को प्रशस्त किया, जिसमें उन्होंने सत्याग्रह को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया, शांति और अहिंसा की राह पर चलने का आह्वान किया। सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम इस समय यह हुआ कि पहले गोखले और फिर कुछ समय बाद तिलक के निधन से हुई रिक्तता को गांधीजी ने नये सहयोगियों के साथ भर दिया। उन्हें मोतीलाल नेहरू का पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ और यहीं से शुरू हुआ कांग्रेस का गांधी-नेहरू युग। इस युग ने पिछली तमाम कार्यपद्धतियों को उलट दिया। गांधीजी ने कांग्रेस के दरवाज़े सबसे पहले आम आदमी के लिए खोले। चार आने की सदस्यता ने लाखों लोगों को कांग्रेस के साथ जोड़ दिया। यह मात्र राजनीतिक अपेक्षाएं और अवसर जुटानेवाली पार्टी से बढ़कर एक आंदोलन का रूप ले चुकी थी। इसी दौर में राजनीति के साथ-साथ सामाजिक विषयों को भी कांग्रेस पार्टी के कार्यक्रमों में जोड़ा गया, जैसे छुआछूत का खात्मा, नशाबंदी, ज़ातपात की भावना का अंत, गंदगी और अस्वास्थ्यकर स्थितियां खत्म करना, स्वास्थ्य सुरक्षा, महिला शिक्षण, खादी-ग्रामोद्योग को बढ़ाना, स्वदेशी का वरण, विदेशी माल का बायकाट, बच्चों के लिए बुनियादी शिक्षा। इसी के साथ उन्होंने गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, असम, पंजाब सभी प्रांतों में गांव-गांव में कांग्रेस का संगठन फैला दिया। देश में गांधी की एक आंधी आ गयी थी। तब एक शायर ने लिखा था -

``कल्लू मियां भी इन दिनों हज़रते गांधी के साथ हैं

गो गर्दो - गुबार हैं आंधी के साथ हैं!''

१९३५-४० के बीच कांग्रेस में एक अत्यंत प्रभावशाली ग्रुप कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नाम से बना, जिसके अगुआ अशोक मेहता, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव हुए। १९३६ में जवाहरलाल नेहरू ने भी इसी ग्रुप को सहयोग प्रदान किया और भारत में समाजवाद की धारणा का सूत्रपात हुआ। सभी ने मिलकर स्थानीय (लोकल) सरकारों के गठन और संचालन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। अनेक प्रांतों में मुख्य मंत्री समाजवादी धारा से चुने गये। संपूर्ण आज़ादी की लड़ाई, जिसे दूसरा स्वतंत्रता संग्राम कहा जा सकता है, १९४२ में ``भारत छोड़ो आंदोलन'' के साथ शुरू हुई और अंगरेज़ों को विवश होकर १५ अगस्त, १९४७ को भारत की आज़ादी की घोषणा करनी पड़ी। ब्रिटेन की इस मजबूरी में नौसेना, सेना, वायुसेना में अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ विद्रोह, सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिंद सेना आदि का बड़ा रोल रहा है, लेकिन देश के विभाजन की त्रासदी आज तक भारत के शरीर में एक पुराने घाव की तरह कसकती है। बहरहाल इस वर्णन के साथ एक निष्कर्ष पर हम ज़रूर पहुंचे हैं और वह यह है कांग्रेस पार्टी, जिसका गठन १८८५ में हुआ था, जो पार्टी मात्र न रहकर १९४७ तक एक आंदोलन का रूप ले चकी थी, वह १९४७ के बाद से देश की आज़ादी को पुष्ट करते हुए अनेक सफलताओं और चंद असफलताओं की मंज़िलें तय करती हुई आज इतिहास के इस दोराहे पर पहुंच चुकी है जहां से उसे अपने भावी रोल को अदा करना है। आज देश में ग़रीबों का कोई पुरसाने-हाल नहीं रह गया है। लोकतंत्र खंडखंड हो रहा है, उसे जोड़ने और एक स्वस्थ राजनीति का सूत्रपात करने की ज़रूरत है। त्रिशंकु अथवा गठबंधन विधायिकाएं सामने आ रही हैं।

गांधी और नेहरू के जमाने में कांग्रेस को जो प्रचंड जन-समर्थन प्राप्त था और जिसके फलस्वरूप आज़ाद प्रजातांत्रिक भारत के पिछले ६०-६२ बरसों में से बीच-बीच में कुल साढ़े सात बरसों को छोड़कर कांग्रेस लगातार सत्तासीन रही है, अब गंठबंधनों पर क्यों आश्रित हो गयी है? उन कई प्रदेशें में जहां कांग्रेस का डंका बोलता था, वह हाशिये पर क्यों पहुंची? अत: कांग्रेस के गिरते हुए ग्राफ़ पर इस १२५ वें स्थापना वर्ष में न सिऱ्फ कांग्रेसियों को, बल्कि एक मज़बूत खुशहाल और सुरक्षित भारत के पक्षधरों को भी गंभीरता के साथ विचार करना होगा।

इसका हल ढ़ूंढ़ने के लिए फिर से गांधी-नेहरू विचारधारा को याद करना होगा कि विकास की हर गतिविधि का केंद्र जब तक आम से भी ग़रीब आदमी नहीं होगा, तब तक कांग्रेस अपनी गौरवशाली ऊंचाई से गिरती ही चली जायेगी। जब तक नीतियां केवल वोट बटोरने की ग़रज़ से बनायी जाती रहेंगी और इस उद्देश्य से कांग्रेस भी सिद्धांतहीन भटकावों में आकर संप्रदायवादी, क्षेत्रवादी, जात-पात वादी, तुष्टीकरणवादी तत्वों के ग़ैरउसूली एजेंडों की लीक पर चलने की भूल को नहीं सुधारेगी और अपने बुनियादी सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय नीति पर वापस नहीं लौटेगी और उस पर मज़बूती से अमल नहीं करेगी, तब तक बहुसंख्यक ग़रीब और आम आदमी का विश्वास उसमें नहीं लौटेगा। ऐसा विश्वास लौटाने के लिए कांग्रेस के नेतृत्व को भारत के बहुरंगी, बहुभाषी, बहुनस्ली, बहुधर्मी और बहुवर्गीय एक अरब से ऊपर विराट जनसंख्या में हर क्षेत्र के नेतृत्व को उभारना होगा। और इस प्रकार देश में एक सच्चे जनतंत्र वर्ग को जनना होगा जिसमें समूचे राष्ट्र के प्रति समर्पित निजी त्याग और जनसेवा की तपस्या में तपे हुए लोग होंगे। हमें उम्मीद है कि ऐसा होगा और ज़रूर होगा। राहुल गांधी यह चमत्कार कर सकते हैं। बस, उनके ``चालीस'' चयनित सहयोगियों के बग़ल में उपरोक्त ``हनुमान चालीसा'' की ज़रूरत है।
 


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