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लोक के कबीर पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित शमशेर अहमद खान   

कुछ समय पहले मुझे गोरखपुर से दिल्ली लौटना था। मैं जिस कूपे में था, इत्तिफाक से मेरे सहयात्री भी मेरी तरह बातूनी थे। एक सज्जन दिल्ली विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर थे, दूसरे गोरखपुर में साइकिल की दुकान चलाते थे और तीसरे रेलवे के ठेकेदार थे और शादी के सिलसिले में अपने परिवार के साथ गोरखपुर आये थे। स्टेशन पर कई लोग छोड़ने आये थे। शायद रुतबा बड़ा था। वे लखनऊ उतरनेवाले थे। बातों-बातों में पता चला कि इस कूपे के सभी सहयात्री कहीं न कहीं समाज सेवा से जुड़े हुए हैं। लखनऊ उतरनेवाले सज्जन सनातनधर्मी थे और कई श्मशान घाटों का पुनरोद्धार उन्होंने अपनी समाज सेवी संस्था के माध्यम से करवाया था। वे हर साल निर्धन परिवार की नवयुवतियों का विवाह अपनी संस्था के जरिये करवाते आ रहे थे।

वे बेहतरीन इंसान भी थे। मेरे दांतों में दर्द था और उन्होंने आनन-फानन में दर्द-निवारक दवा उपलब्ध करा दी। नतीजा यह हुआ कि मैं उनकी बातों में रुचि लेकर कुछ ग्रहण कर सका। साइकिल की दुकान चलानेवाले सज्जन भी यतीम लड़कियों की शादी हर साल अपनी किसी संस्था के जरिये कराते। इस नेकी के काम में उनके हाथ जले भी थे। चूंकि मेरा घर गोरखपुर की तरफ है और कई बार निजी कामों के लिए आना-जाना लगा रहता है, लेकिन इस बार दिल्ली के एक दोस्त की मदद के लिए गोरखपुर आना था, इसलिए मैं भी खुद को किसी समाजसेवी से कम नहीं समझ रहा था।

शायद यह मेरा अति आत्मविश्वास रहा हो। बातों का सिलसिला आपस में जब शुरू हुआ, तब बिना कॉमा, पूर्णविराम के चलता गया। मेरे सामनेवाले सज्जन मुसलिम थे और शायद मेरे मुसलमान होने के अहसास से पैदा होनेवाली संवेदना भी हासिल करना चाह रहे थे, लेकिन अपने सहज व्यवहार और भारतीयता में अंतर्निहित निरपेक्ष भाव से मैं रत्ती भर भी नहीं खिसकना चाहता था। बातों-बातों में मैंने स्पष्ट कर दिया कि हालांकि मेरा निजी धर्म इस्लाम है, लेकिन मैं सम्राट अशोक के सौहार्द्र और संप्रदाय प्रेम का आशिक हूं। इस मुसाफिरी संगोष्ठी में कई बातों पर गहन विचार-विमर्श हुआ और सबकी राय यही बनी कि सम्राट अशोक का संप्रदाय सौहार्द्र और प्रेम आज भी मानव कल्याण के लिए मुफीद है।

अंत में इस चल-संगोष्ठी के समापन पर गोरखपुर वाले सज्जन ने पूछा कि साहब चलिये सभी धर्मों की बातें अच्छी हैं और सबका सम्मान और आदर ही अशोक का सिद्धांंत था। सब अच्छा है, लेकिन यह मेरी समझ में नहीं आया कि कबीर आज भी प्रासंगिक क्यों हैं।

मैं कुछ पल उनके चेहरे को गहरायी से पढ़ता रहा। किसी ने जवाब नहीं दिया। जो ऐतिहासिक संत एक सौ सत्रह साल की अवस्था और अपने जीवन के अंतिम काल में नगरीय जीवन के चकाचौंध को छोड़ कर मगहर जैसे ऊसर-अकालग्रस्त क्षेत्र में जनकल्याण के लिए आने को तत्पर हो, उनके संबंध में इस प्रकार के सवाल उठाना अजीब था। मैंने विनम्रतापूर्वक उनसे कहा - `जनाब यह अफसोस की बात है कि मगहर से सटे गोरखपुर के लोगों को यह भी जानकारी न हो कि कबीर मगहर आये क्यों!' फिर मुझे अपने लोकतंत्र की उस व्यवस्था पर रोष आया जो आज़ादी के बासठ वर्षों बाद भी कबीर जैसे लोकतंत्रवादी महापुरुषों के कार्यों की जानकारी सुलभ नहीं कर पायी और केवल स्कूल, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में साखी, सबद और रमैनी का वाचन और बुद्धि-विलास के लिए चर्चा-परिचर्चा करा लेना ही पर्याप्त मानती रही।

कबीर ऐसे संत थे, जिन्होंने श्रम की महत्ता पर जोर दिया, भीख मांग कर शरीर साधने वाली साधना को नकारा और लोकतंत्र के उच्चतम मानकों को प्रतिस्थापित किया। अफसोस की बात यह है कि हम बहुत ही छोटे स्वार्थों में घिर कर ऐसे कालजयी महापुरुषों को दरकिनार करते हैं। ओछी राजनीति में पड़ कर तमाम मानवाधिकारों को नज़रअंदाज़ करते रहते हैं और लोकतंत्र के अलंबरदार होने का भी दावा करते हैं। विश्व और मानव कल्याण के लिए जिस अंतर्दृष्टि को कबीर जैसे महापुरुषों ने भारतीय जनमानस को दिया, आज हमें ऐसा कोई उदाहरण दिखायी नहीं देता।

भौतिकवाद के इस युग में चमकीले आवरणों से युक्त प्रस्तुत की जानेवाले सामग्री को छोड़ कर भला कौन इस अमृतमय उपदेश को ग्रहण करना चाहेगा। मेरी बातों से सामनेवाले सज्जन को कितनी संतुष्टि हुई, यह मुझे नहीं मालूम, लेकिन लोक के लिए मानवता, प्रेम और सौहार्द्र के संदेश के रूप में कबीर का व्यक्तित्व मेरे लिए हमेशा सुकून का कारण रहा है।
 


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