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जर्मन में बर्फबारी पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित सुशीला शर्मा हक़   

ग्यारह फरवरी, १९६६ को विभाजित जर्मनी के पश्र्चिमी हिस्से में आना हुआ। नंगे पेड़, चमकती कारें, गोरे लोग, सब कुछ अजीब सा लगा। शाम को रंगबिरंगे कपड़े पहने हुए ``हुंबा, हुंबा, हुंबा, तेतरे'' गाते हुए जर्मनों के झुंड पबों के बाहर और अंदर जाते हुए नज़र आये। नीले-लाल यूनिफॉर्मनुमा कपड़े पहने हुए लोगों का झुंड मेरी ओर बढ़ा। एक ने आगे आकर बड़े अदब से मेरा हाथ चूमा और बोला

``इंडिया की राजकुमारी तुम्हारा स्वागत है।'' अपने घेरे में लेकर ये मुझे एक पब में ले गये, जहां रंगबिरंगी तोरणों से कमरा सजा हुआ था। अधपिये और खूब पिये औरतें - आदमी सभी झूम-झूम कर हुंबा हुंबा गा रहे थे। समझ में कुछ नहीं आया, मगर अच्छा खूब लगा। जर्मनों की दरियादिली और खुशमिज़ाजी ने बड़ा प्रभावित किया। मेरे खानेपीने के पैसे भी मुझे नहीं देने पड़े। तीन दिन बाद एक बच्चा फटी आंखों से मेरी ओर देखता हुआ बोला ``आंटी अब अपने चेहरे का ब्राउन रंग पोंछ डालो, कार्निवाल समाप्त हो गया।'' अब समझ में आया ११ से १३ फरवरी तक यहां कार्निवाल मनाया जा रहा था। लोगों ने समझा था कि जैसे उन्होंने राजा, चोर, सिपाही के परिधान पहने हुए थे मैंने राजकुमारी का परिधान पहना होगा और अपने आपको भारतीय महिला का रूप दिया होगा। नौकरी तो मुझे पहले दिन से ही एक फैक्टरी में मिल गयी थी। एक दिन फैक्टरी के बाहर देखा तो सारा नज़ारा बर्फ की चादर में लिपटा हुआ नज़र आया। सफेद वृक्ष, सफेद मकान, सफेद कारें, लगा मानो किसी परी ने जादू की छड़ी घुमा कर समस्त धरा पर दूधिया रंग बिखेर दिया हो। जर्मन सहकर्मियों को आश्र्चर्य हुआ जब मैंने छुट्टी लेने की इच्छा व्यक्त की। छुट्टी लेकर मैंने डुइसबर्ग शहर के जंगल की ओर प्रस्थान किया। रूई के फाहों जैसी बर्फ के ढेर में पैर धंसते चले जाते थे और जंगल का सफेद नज़ारा देखते हुए मैं आगे बढ़ती जा रही थी। न तो ठंड लग रही थी और न ही थकावट महसूस हो रही थी, हां, भूख ज़रूर लगने लगी थी, सो लौटने की सोची। हर ओर बर्फ ही बर्फ, लौटने का रास्ता कहीं से भी नज़र नहीं आ रहा था। काफी देर तक जंगल में भटकना पड़ा। परमात्मा की दया से कुछ पुलिस वाले अपने कुत्ते के साथ मिल गये, जो इसी काम के लिए तैनात थे कि जंगल में भटक जानेवालों की मदद कर सकें। इन्होंने मुझे सड़क तक छोड़ा। घर पहुंचते-पहुंचते रात हो गयी, मगर सफेद बर्फ के कारण रात में भी चांदनी सी बिखरी हुई थी।

अबकी बर्फ

जर्मनवासियों को सालभर इंतज़ार रहता है सफेद क्रिसमस का, सो तो इन्हें परसाल भी नहीं मिली, लेकिन उससे पहले और उसके बाद ऐसी जबर्दस्त बर्फबारी हुई कि थमने का नाम ही नहीं ले रही। सड़कों के किनारे बर्फ के पहाड़ बन गये। मौसम विभाग का कहना था कि पिछले दस सालों में जर्मनी में ऐसी बर्फबारी नहीं हुई। स्वयं ही अपनी गिनती में सुधार करते हुए फरवरी दो हज़ार दस में मौसम विभाग ने उद्घोषणा की कि जब से मौसम के हाल के बारे में पूर्व सूचनाएं प्रसारित की जा रही हैं, तब से लेकर आज तक लगातार इतने लंबे अरसे तक बर्फ कभी नहीं पड़ी। यह बात और है कि कड़ाके की ठंड इससे कहीं ज़्यादा पड़ चुकी है। विकासशील इस देश में भी उन साधनों का अकाल पड़ गया, जिन्हें बर्फ हटाने के लिए काम में लाया जाता है। राजनेता चुनाव की उठापटक में लगे हुए थे और व्यापारी अर्थव्यवस्था से परेशान। एक परदेसी ने इन दोनों परिस्थितियों को पहले से ही भांप लिया और नमक का भंडार जमा कर लिया। यहां यह बतलाना ज़रूरी है कि सड़कों पर बर्फ को पिघलाने के लिए नमक का छिड़काव किया जाता है। सरकारी खज़ाने में पैसों का अभाव तो पहले से ही था अब नमक का अभाव भी हो गया। नमक का छिड़काव करनेवाली गाड़ियां इस अभाव के कारण हाईवे पर ऐसी फंसीं कि आगे नहीं बढ़ पायीं। सड़कों का यह हाल हो गया मानो आप रास्ते पर नहीं शीशे पर गतिमान होने की कोशिश कर रहे हों। लोग फिसले, गाड़ियां उलटीं और ट्रकों के उलट जाने से भयंकर दुर्घटनाएं हुइंर्। ट्रकों के गंतव्य स्थान पर पहुंचने से पहले ही सामान ऑटोबान यानि कि हाईवे पर बिखर गया। इस सामान को हटा पाने में फायर ब्रिगेड और पुलिसवालों को इतनी ठंड में भी पसीना छूट गया। घंटों काम पर जानेवाले लोग रास्ते में अटके रहे। सर्दियों की छुटिटयों में नौबत यहां तक आ गयी कि लोगों को सारी रात बीच सड़क पर अपनी गाड़ी में ही गुज़ारनी पड़ी। बर्फ पर फिसल कर दो ट्रकें टेढ़ी होकर पड़ी थीं। पहिये अपनी जगह पर ही घूम-घूम कर रुक जाते। जानमाल के खतरे को ध्यान में रख कर सरकार को आखिर उस परदेसी नमक के दरोगा से मनमानी क़ीमत पर नमक ख़रीदना पड़ा। हाईवे पर गाड़ियां फिर दौड़ने लगीं।

इस लेख की लेखिका चूंकि जर्मनी की राजधानी बर्लिन में रहती हैं, तो अब यहां का आंखों देखा हाल यह है कि बड़े-बूढ़ों का सड़क पर निकलना मुहाल है। बच्चों के ऐश हैं। जमी हुई बरफ पर रपटने का अपना ही मज़ा है। स्लेज गाड़ियों पर खींच कर ही मां-बाप उन्हें किंडेरगार्डेन या स्कूल ले जाने लगे। एकाधबार तो स्कूलों तक को बंद रखना पड़ा। डर के मारे लोगों ने खानेपीने की चीजों को जमा करना शुरू कर दिया। सबसे ज़्यादा कष्ट घरेलू जानवरों को हुआ। इनको हगाने और मुताने कहां ले जायें। सफेद झक्क बर्फ पर इनकी और इनके मालिकों दोनों की कारस्तानियां नज़र आने लगीं। रात नयी बर्फ ने इस सबको ढकमूंद दिया। जब बर्फ की सतह और सतह पिघलेगी, तब की गंदगी के बारे में सोच कर अभी से उबकाई आती है। घर में भारत की खबरों को सुनने के लिए जीटीवी लगा रखा है। उस पर खबरें आ रही हैं कि काश्मीर में खूब बर्फ गिरी। सैलानियों को बड़ा मज़ा आया। किसान भी खुश हैं, अबकी बार सेबों की फसल खूब अच्छी रहेगी, लेकिन सेना के जो जवान बर्फ के नीचे दब कर मर गये उनके लिए तो यह जानलेवा ही रही। यहां भी बर्फ के कारण दुर्घटनाओं में कई लोग मरे। एक स्पोट्र्स क्लब की छत बर्फ के बोझ के कारण ढह गयी। सुना मनाली में भी अबकी बार खूब बर्फ पड़ी। सैलानियों की खुशी का ठिकाना नहीं। होटलों ने खूब कमाया, मगर ग़रीबों के घर में चूल्हा न जलने की और ठंड में ठिठुर कर मर जाने की कोई खबर कम से कम विदेशों तक नहीं पहुंची। पाठकों को जानकर आश्र्चर्य होगा कि जर्मनी में भी सैकड़ों लोग कुछ अपनी मर्जी से और कुछ मजबूरी से बेघरबार हैं। कुछ समाजसेवी संस्थाओं ने इनकी देखभाल का बीड़ा उठाया। इनके सोने और रहने की व्यवस्था स्कूलों और स्पोट्र्स भवनों में की गयी। सरकार की ओर से अंडरग्राउंड मेट्रो स्टेशन जो रात को बंद कर दिये जाते थे, खोल दिये गये, जिससे लोग यहां सर्दी से बच कर रात बिता सकें। हर बड़े स्टेशन पर मसलन बर्लिन, हैंबर्ग, हनोवर, म्यूनिक, इत्यादि में ट्रेन के न आने या छूट जाने पर गर्म कमरों में ठहरने, चाय और जलपान की मुफ्त व्यवस्था की गयी। इस काम को धार्मिक संस्थाएं अन्य मौसम में भी करती हैं।

जर्मनों ने कार के स्थान पर काम पर जाने के लिए सार्वजनिक साधनों का उपयोग करना शुरू कर दिया है। फिसलती सड़कों पर कार चलाना खतरे से खाली नहीं है। सड़कों के किनारे बर्फ के ढेर अब इतने ऊंचे हो गये हैं कि कार का एक ओर का दरवाजा तक नहीं खुल पाता। बर्लिन जर्मनी की राजधानी ही नहीं है, इस शहर को हरा शहर भी कहा जाता है। यहां के नागरिक पर्यावरणप्रिय हैं। सड़कों पर या कहीं भी नमक के छिड़काव पर पाबंदी है, क्योंकि नमक पेड़-पौधों को बहुत नुकसान पहुंचाता है। नमकवाला पानी पेड़ों की जड़ों तक पहुंचेगा तो वृक्ष मर जायेंगे, इसलिए यहां काली कंकरीट का छिड़काव किया जाता है, जिससे बर्फ पर चलने पर आपके जूतों को कुछ तो पकड़ मिले। इस छिड़काव से और महीनों से जमी बर्फ के कारण सड़कें टूटफूट गयी हैं। जहां बर्फ पिघलती है वहां तलैया है, जहां नहीं वहां सब ऊबड़खाबड़ है। जर्मनी के कुछ द्वीपों पर हेलीकॉप्टर से खानेपीने का सामान पहुंचाया जा रहा है और वहां से यात्रियों को हेलीकॉप्टर से ही स्थानांतरित किया जा रहा है। पड़ोसी के घर में पानी नहीं आ रहा। बर्फ जम जाने के कारण पानी का पाइप फट गया। अगल-बगल के तहखानों में बर्फ पिघलने के कारण पानी भर गया और सारा माल-असबाब तबाह हो गया। जब यह बरफ पिघलेगी तो नदियों में बाढ़ आयेगी, उसके नीचे जमी गंदगी सामने आयेगी, सड़कों के गड्ढे नज़र आयेंगे। बर्फ का सफेद सुंदर रूप तब कितना वीभत्स होगा इसकी कल्पना तक कर पाना मुश्किल है। अपने हीटर चलते घर के गर्म कमरे में बैठ कर मैं यह लेख लिख पा रही हूं। नलों में गर्म पानी की कमी नहीं है और न ही समय-असमय बिजली जाती है। इस आराम की कुछ तो क़ीमत चुकानी पड़ेगी।

अंतिम अद्यतन ( बुधवार, 10 मार्च 2010 12:25 )
 


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