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बड़ा त्याग, बड़ा दिल पीडीएफ़ मुद्रण ई-मेल
द्वारा लिखित संपादकीय   
अब चूंकि गतिरोध ख़त्म हो गया है और महाराष्ट्र में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की सरकार शपथ लेने जा रही है तो ज़रूरी हो गया है कि ये दोनों पार्टियां अपने आपसी रिश्तों पर गंभीरता के साथ विचार करें। चुनाव शुरू होने और नामज़दगी से पहले की खींचातानी और चुनाव जीत लेने के बाद मंत्रिमंडल में पदों के लिए रूठमनानी यही साबित करते हैं कि सरकार चलाने में भी इनके संबंधों में तनाव बना रहेगा। वक़्त का तक़ाज़ा तो यही था कि ३ नवंबर से पहले, जबकि इस विस का कार्यकाल समाप्त होता है, बल्कि चुनाव नतीजों की घोषणा होते ही कांग्रेस के मनोनीत मुख्य मंत्री अशोक चव्हाण और उप मुख्य मंत्री छगन भुजबल राज्यपाल एससी ज़मीर के पास जाकर नयी सरकार बनाने का दावा पेश कर देते और जैसी कि परंपरा है नयी सरकार का शपथ ग्रहण हो जाता, नयी विधानसभा आहूत कर ली जाती, सभी नव-निर्वाचित सदस्यों का भी शपथ ग्रहण हो जाता और नये जन-प्रतिनिधि और मंत्रीगण अपने-अपने कामकाज पर जुट जाते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

आज महाराष्ट्र में कितनी ही आम लोगों की निजी, विकास संबंधी सार्वजनिक तथा मानवीयता से जुड़ी समस्याएं नये निर्णयों के इंतज़ार में धूल फांक रही हैं। राज्य के मतदाताओं ने अपना निर्णय कब का सुना दिया था। राकांपा और कांग्रेस को उनके निर्दलीय समर्थकों सहित पूर्ण तथा स्पष्ट बहुमत दे दिया था, लेकिन जिन्हें उसने कार्य करने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी उसने इतनी ढील बरती कि इसका मतदाताओं को कोई अच्छा संदेश तो निश्र्चित ही नहीं मिला है। जनता की आस्था एक सक्षमता और सुदक्षता के साथ काम करनेवाली सरकार प्रति ऐसे टालमटोलों से क्या कभी मज़बूत हो सकती है?
 
जिस तरह से ज़्यादा बड़े बजट और विस्तृत जनसंपर्क से जुड़े विभागो के लिए दोनों सहयोगियों के बीच मारामारी चलती दिख रही है और ख़ासतौर पर राकांपा जिस तरह से कम सीटें जीतने के बावजूद ज़्यादा मलाई काटने की ज़िद पकड़े रही और जिस तरह से कांग्रेस ने बड़प्पन का सबूत देते हुए उसकी मानमनौवल की उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि इन दोनों पार्टियों को अपनी सगाई को शीघ्र ही शादी में बदल लेना चाहिये। सारी धौंस, सारे अलग फूटने के दिखाव और सारी तल्ख़ियों के बावजूद जिस तरह से लोटपोट करके इन्हें एक सरकार में बैठना पड़ रहा है वह यही साबित करता है कि बुनियादी तौर पर पदों के अलावा इनमें कोई सैद्धांतिक मतभेद नहीं है, लेकिन पदलोलुपता ही सिद्धांतों को ताक पर रखकर असहनशीलता की पराकाष्ठा में बदल जाती है और तलाक का कारण बन जाती है।
 
भारत में सभी प्रदेशों में आयाराम-गयारामों का जो दौर शुरू हुआ है उसकी जड़ में पदलोलुपता ही रही है। यदि नेताओं के मन में जनता की सुख समृद्धि और विकास सर्वोपरि हो तो ये सब भटकाव कहीं नहीं ठहरेंगे। सब मिलजुलकर काम कर सकते हैं, जनहित के काम, प्रदेश को उन्नत बनाने के काम और देश को इस सदी की चुनौतियों को वहन करने योग्य बनाने के काम। हमारा विश्वास है और हम पहले भी लिख चुके हैं कि यदि राकांपा वापस कांग्रेस में लौट आये, वे अहं का कुछ त्याग करें और लौट और लौट आना मान्यवर शरद पवार साहब के लिए कोई नयी बात भी नहीं है- तो पुन: एकीकृत कांग्रेस देश में टूटन की राजनीति में एक नयी जुड़न की शुभ धारा प्रवाहित करेगी। वैसे भी राकांपा का अब अलग कोई औचित्य रह भी नहीं गया है। सोनियाजी के विदेशी मूल का सवाल इस सवाल के जनक पीए संगमा ने ही वापस गटक लिया है। पवार साहब ने तो उन जैसी कटुता तब भी नहीं दिखायी थी जब अलग हुए थे। तो अब अलग क्यों रहें।
 
जनता दल बिखरा हुआ है। भाजपा बिखराव की दिशा में अग्रसर होती दिख रही है। समाजवादी व्यक्तिवादी हो गये हैं। वामपंथी भी टूटे और आज सर्वहारा का नेतृत्व सर्वग्राहों के हाथों में चला गया है। यह सब नयी स्वस्थ दिशा में मोड़ा जा सकता है और देश में पुन: गंगा, यमुना और सरस्वती की तरह ये तीन वेणियां अपनी-अपनी गरिमा के साथ राष्ट्र की राजनीति और अर्थव्यवस्था को समायोजित कर सकती हैं। लेकिन पहल तो कांग्रेस को ही करनी होगी, गंगा की तरह उसे अपना दिल बड़ा करना होगा, यमुना और सरस्वती की तरह विमुख धाराओं को पुन: अपने गंतव्य की ओर मुड़ना होगा। सभी गंगाओं को अपने-अपने अंशों को बुनाना होगा। सभी अंशों को वापस जाना होगा। तब देश में स्वस्थ राजनीतिक प्रक्रिया शुरू हो जायेगी।


 


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