उक्रांद ने सरकार में शामिल होकर भाजपा के सहयोगी की भूमिका निभायी। राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो उक्रांद ने हमेशा भाजपा का साथ दिया है। इसे राजनीतिक मजबूरी कहें या फिर वक़्त की नज़ाकत, विधानसभा उपचुनाव न लड़ने का फैसला कर उक्रांद ने भाजपा को फायदा ही पहुंचाया है। दोनों दलों के बीच गठबंधन के बाद विकासनगर तीसरा उपचुनाव था। धुमाकोट विधानसभा उप चुनाव में उक्रांद ने भाजपा के समर्थन में कोई उम्मीदवार न उतारकर भाजपा का साथ दिया। उसके बाद पौड़ी संसदीय सीट के लिए उप चुनाव हुआ, जिसमें उक्रांद ने भाजपा प्रत्याशी टीपीएम रावत के समर्थन में चुनाव नहीं लड़ा। इसका भी भाजपा को फायदा पहुंचा। हालांकि इसके बाद स्थानीय निकाय तथा पंचायतों के चुनाव में दोनों दलों के बीच तालमेल न होने से दोनों ने एक-दूसरे के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा। इसके बाद प्रदेश में राजनीतिक उथल-पुथल के कारण एक बार फिर उक्रांद ने भाजपा का साथ देकर उसे राजनीतिक संकट से बाहर निकालकर सहयोगी की भूमिका बखूबी निभायी। इस चुनाव में एक बार फिर से उक्रांद की दोस्ती भाजपा के लिए फायदेमंद रही। चुनाव परिणाम पर यदि गौर करें तो जीत का अंतर मात्र ५९३ वोट का ही रहा। राजनीतिक विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि उक्रांद भाजपा के साथ न होते तो तस्वीर बदल सकती थी।
प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना को झटका -नूतन सवेरा संवाददाता देहरादून : वन भूमि हस्तांतरण न होने की वजह से उत्तराखंड में प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना को गहरा झटका लगा है । इस योजना के अंतर्गत बनने वाली १९२ सड़कों का निर्माण कार्य अधर में लटक गया है। इनमें से १४८ मार्ग ऐसे भी हैं जिन पर अभी कार्य प्रारंभ भी नहीं हो सका है। सड़कों के अभाव में राज्य के सैकड़ों गांव अब भी विकास की धारा से कोसों दूर खड़े हैं। सूबे के प्रत्येक गांव को सड़क से जोड़ने की योजना में वन भूमि आड़े आ रही है। प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत स्वीकृत होने के पश्चात १८५ सड़कें ऐसी भी हैं जिन पर अभी कार्य प्रारंभ नहीं हो सका है। राज्य में विडंबना है कि वन भूमि के कारण अधिकांश योजनाएं दम तोड़ देती हैं। कुमांऊ मंडल की ७० सड़कें निर्माण की प्रतीक्षा कर रही हैं। इसके अतिरिक्त सात सड़कें ऐसी भी हैं जिनका कार्य उधर में लटका हुआ है। जानकारी के अनुसार भूमि हस्तांतरण के पश्चात भी कार्य प्रारंभ होने में दो वर्ष तक लग सकते हैं, इसलिए प्रदेश के लोगों को काफी इंतजार करना पड़ सकता है। जानकारी के अनुसार इसके अतिरिक्त सात सड़के ऐसी भी हैं, जिनका कार्य अधर में लटका हुआ है जिसमें टिहरी में ४, बागेश्वर, पिथौरागढ़ तथा रुर्द्रैंप्रयाग की सड़कें शामिल हैं।
सूत्रों का कहना है कि वन संरक्षण अधिनियम उत्तराखंड में विकास कार्यों में बैरियर बनकर सामने आ रहा है। भारत सरकार को चाहिये कि इस संदर्भ में राज्य के अधिनियम के प्रावधानों को शिथिल करे।
| उत्तराखंड में आपदाओं ने ली १०६जानें - कमलेश भट्ट देहरादून : उत्तराखंड में इस वर्ष विभिन्न आपदाओं में राज्य के १०६ लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। इस विनाशलीला में कितनी सरकारी और निजी संपत्ति का नुकसान हुआ है, इसका आंकलन होना अभी बाकी है। अभी भी प्राकृतिक और दैवीय आपदाओं का क़हर जारी है। प्रदेश में हर वर्ष शुरू होते ही विभिन्न आपदाएं डेरा डालना शुरू कर देती हैं, जिसके कारण प्रत्येक वर्ष उत्तराखंड में जानमाल की भारी हानि होती है। आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार एक जनवरी से मई के अंत तक विभिन्न आपदाओं में २० लोग अपनी जान गंवा चुके थे। अप्रैल और मई के प्रारंभ में बढ़े तापमान ने सूबे के जंगलों को बड़े पैमाने पर अपनी चपेट में ले लिया था, और १४ लोग इस अग्निकांड की भेंट चढ़ गये, जबकि छह अन्य भूस्खलन जैसी आपदाओं का शिकार हुए। उस दौरान वनों की आग से बचने के लिए वन विभाग और प्रदेशवासियों को मानसून का बेसब्री से इंतज़ार था। मानसून तो आया पर इस बार फिर सूबे में क़हर बरपा। मानसून के दौरान पिथौरागढ़ के नाचनी ग्राम में बादल फटने से ४५ लोग मलबे में समा गये जिनके शव भी नहीं निकाले जा सके। इसके अलावा प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में भी भूस्खलन, चट्टान खिसकने जैसी घटनाएं हो रही हैं। आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार बरसात देर से होने के कारण प्रदेश की नदियों का जल स्तर तो सामान्य पाया गया, किंतु यह कब तक स्थिर रहेगा कुछ नहीं कहा जा सकता।
मानसून सत्र में जनपदवार मरे लोगों की सूची पिथौरागढ़ ५०, नैनीताल ०८ उत्तरकाशी ०१, चमोली ०७ चम्पावत ०१, ऊधमसिंह नगर ०१
देहरादून ०१, अन्य ०७, अग्निकांड १४
|