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मंगलवार, 29 सितम्बर 2009 00:00

समाज के सच-झूठ को उज़ागर करती फ़िल्मों का प्रदर्शन

ब्रजेश कुमार 

 

 

मुंबई : गत दिनों `मामी' (मुंबई एकेडमी ऑफ द मूविंग इमेज) के संयोजन में `११वां अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मोत्सव' का आयोजन मुंबई में फन रिपब्लिक, अंधेरी (प.) समेत कई जगहों पर संपन्न हुआ। २९ अक्टूबर से ५ नवंबर तक चले इस फ़िल्मी मेले में दुनिया के ५६ देशों की २०० फ़िल्में दिखायी गयीं। इस मेले की प्रायोजक थी अनिल धीरूभाई अंबानी की कंपनी `रिलायंस बिग इंटरटेनमेंट।' मेले का उद्घाटन सूचना-प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी के हाथों हुआ। फ़िल्मोत्सव की खासियत यह थी कि इसमें वर्ष २००९ में बनीं विश्व-सिनेमा की चुनिंदा फ़िल्में दिखायी गयीं।

ऑस्कर विजेता स्टीवन सोदरबर्ग निर्देशित फ़िल्म `द इंफॉर्मेंट' के प्रदर्शन के साथ इस मेले की शुरुआत हुई। सच्ची घटनाओं पर आधारित यह एक डार्क पॉलिटिकल कॉमेडी फ़िल्म है। सामयिक विषय के चयन के कारण यह फ़िल्म चर्चा में है। दूसरी चर्चित फ़िल्मों में डेनमार्क की मार्टिन पीटर झेंडलिट निर्देशित `एप्लॉज' का समावेश है। यह फ़िल्म इसकी मुख्य किरदार मशहूर अभिनेत्री थिया बार फोड के ईदगिर्द घूमती है, जिसका दिमागी संतुलन गड़बड़ा गया है। मानसिक संतुलन बिगड़ने के कारण बच्चे को संभालने में असमर्थ इस अभिनेत्री से उसका बच्चा छीन लिया जाता है तथा पति भी उसे तलाक दे देता है। पारिवारिक जीवन बिखरने का कारण नायिका का अत्यधिक शराब सेवन और कैरियर को लेकर मानसिक तनाव है, किंतु अपने बुरे अतीत से छुटकारा पाकर वह बच्चे को अपने पास रखना चाहती है। फ़िल्म के कई दृश्य मां के ममत्व को बड़े प्रभावशाली ढंग से परदे पर साकार करते हैं।

सच्ची घटना पर आधारित जेम्स मार्श निर्देशित फ़िल्म `मैन ऑन वायर' साहसिक कारनामें को अंजाम देनेवाली फ़िल्म है। न्यू यॉर्क के टि्वन टावर्स (जिसे आतंकवादियों ने ध्वस्त कर दिया) पर रस्सी बांध कर इतनी ऊंचाई पर कलाबाजी दिखाता फिलिप पेटिट उस पर बेखौफ चलता है। अपने कार्य को अंजाम देने के लिए उसे किन-किन बाधाओं का सामना करना पड़ता है, फ़िल्म इसे बेहद मजेदार और खूबसूरत अंदाज़ में पेश करती है।

`द लिटिल वन' इटली के निर्देशक द्वय टिज़ा कोवी और टाइनेर फ्रि मेल की बहुत ही संवेदनशील फ़िल्म है। सर्कस में काम करनेवाले दंपत्ति को एक दिन भारी वर्षा में भीगती एक बच्ची मिलती है। साथ में एक चिट भी पड़ी है, जिस पर लिखा गया है कि बच्ची को छोड़नेवाली उसकी मां एक दिन ओयगी और एशिया (बच्ची का नाम) को ले जायेगी। नायिका का पति बच्ची को पुलिस के हवाले कर देना चाहता है, लेकिन नि:संतान पैटी इस खूबसूरत और स्मार्ट बच्ची को अपने संग यह कहकर रखती है कि एक दिन इसकी मां ज़रूर आयेगी। स्त्री हृदय में छुपी अथाह करुणा की कहानी कहती यह फ़िल्म समारोह की एक उल्लेखनीय फ़िल्म थी। फ़िल्म ``किनाटे'' के निर्देशक ब्रिलांटे मेंडोजा इस फ़िल्मोत्सव के जूरी मेंबर थे। फ़िल्म में कुछ लोग एक औरत को ले जाकर उसकी हत्या कर देते हैं। हत्या जैसे जुर्म को फ़िल्मी परदे पर एक ख़ौफ़नाक अनुभव में तब्दील कर देने की कहानी है `किनाटे'। एड्रियन विनिज निर्देशित फ़िल्म `गिगांटे' अपने साधारण विषय किंतु लाजवाब कथ्य के कारण एक उल्लेखनीय फ़िल्म है। मायक जाटा एक सुपर मार्केट में सिक्युरिटी गार्ड है। अपने एकाकी जीवन से ऊबकर वह अपने साथ काम करनेवाली `जलिया' की तरफ आकर्षित होता है, लेकिन पहल कैसे करे यह उसे पता नहीं है। नायिका का वह छुप-छुपकर पीछा करता है। फिल्म काफी धीमी है, किंतु नायक के भोलेपन को बखूबी बताती है। फ़िल्म का अंत सुखद है।

भारतीय सिनेमा खंड के अंतर्गत क्षेत्रीय भाषाओं की फ़िल्मों का प्रदर्शन हुआ। हिंदी में विशाल भारद्वाज निर्देशित `कमीने' दिखायी गयी। मुंबई के अंडरग्राउंड जगत को उधेड़ती यह फ़िल्म अपने सिनेमेटिक तकनीकी का प्रभाव छोड़ने में सफल रही। युवा निर्देशक अमित राय की पहली फ़िल्म `रोड टू संगम' मुसलमानों की पाकिस्तान परस्ती की खबर लेती है, किंतु निर्देशक ने शोध की कमी के चलते कुछ चलताऊ संवाद नायक परेश रावल से कहलवाये हैं, जो असंगत जान पड़ते है। विषय अच्छा होने पर यह एक अच्छी फ़िल्म बन सकती थी, लेकिन यह एक सतही और लंबी फ़िल्म बनकर रह गयी। हालांकि परेश रावल के अभिनय ने फ़िल्म में जान फूंकने की भरपूर कोशिश की है।

यूनानी सिनेमा के दिग्गज फ़िल्मकार थियो एंजोलो पाउलोस की फ़िल्में सिंहावलोकन खंड में दिखायी गयीं। इसी खंड में अमरीकी पटकथाकार और निर्देशक पॉल श्रेडर की फ़िल्में दिखायी गयीं। मशहूर हिंदी फ़िल्म निर्देशक बी.आर. चोपड़ा की फ़िल्म `नया दौर' का प्र्रदर्शन उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए किया गया। फ़िल्मों में अपने उल्लेखनीय योगदान के लिए अभिनेता शशि कपूर को भी सम्मानित किया गया। यूनानी फ़िल्मकार थियो एंजोलो पाउलोस की फ़िल्म `द डस्ट ऑफ टाइम' के साथ `मामी' फ़िल्मोत्सव का समापन हुआ।

 

 

 

नेहा का योग प्रेम

छलकाये हुए फिरना, ख़ुशबू लबो-लाली की
इक बाग़-सा साथ अपने, महकाये हुए रहना

 

 


नेहा धूपिया के चेहरे की लाली इन दिनों बढ़-सी गयी है। लेकिन इससे पहले कि आप अंदाजा लगाने लगे कि कहीं उन्हें नया बॉय फ्रेंड तो नहीं मिल गया, हम आपको बता दें कि नेहा नियमित योग करती हैं और उनके चेहरे की यह लाली उस योग की ही बदौलत है। कुछ दिनों पहले नेहा धूपिया को न्यूयॉर्क जाना पड़ा तो उन्होंने सबसे पहले यह पता लगाया कि न्यूयार्क में योग क्लासेस हैं या नहीं। नेहा कहती हैं कि ``योग उन्हें न सिर्फ फ़िट रखता है बल्कि तनाव से मुक्ति भी दिलाता है।'' नेहा ठीक कहा आपने घर बैठे मोटी होने से तो योग करना बेहतर ही है।


स्टायलिश अभिनेता थे फ़िरोज़ ख़ान
- साधना तिवारी

 

 


बड़ी-बड़ी और ऊंची पहाड़ियों, घोड़ों की टापों की आवाज़ और बैकग्राउंड में बजनेवाला एक ऐसा संगीत जो दिल की धड़कनें और कौतूहल दोनों बढ़ा देता है, ऐसे में दिमाग में एक ही सवाल घूमने लगता है कि अब क्या होगा? तभी घोड़े पर सवार एक बहादुर युवक परदे पर प्रस्तुत होता है। उसके खास और अलग कपड़ों से समझने में देर नहीं लगती कि वह मनमौजी और दिलेर किस्म का इंसान है। फ़िल्मी नायक के इसी दिलेर और स्टायलिश अवतार को भारत लाने का श्रेय `फ़िरोज खान' को जाता है।
२५ सितंबर, १९३९ को पठान पिता और इरानी माता के घर जन्मे फ़िरोज खान दिल, शौक और अंदाज़ से बिल्कुल पठान थे। पूरा जीवन अपने खास अंदाज़ को समर्पित करते हुए फ़िरोज ख़ान ने हिंदी फ़िल्म जगत को एक शानदार, ज़िंदादिल और बहादुर नायक दिया। फ़िल्म `खोटे सिक्के' में उनके इसी अंदाज़ की झलक मिलती है। १९६० में फ़िल्म `दीदी' से अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत करनेवाले फ़िरोज ख़ान को पहचान और सफलता मिली फ़िल्म `ऊंचे लोग से'। शुरुआती दौर में फ़िरोज को ज़्यादातर फ़िल्मों में सहनायक के तौर पर प्रस्तुत किया गया और बतौर अभिनेता उन्हें कई ऐसी फ़िल्मों में भी काम करना पड़ा, जिसे लोग कभी याद ही न कर पाये। लेकिन इस खूबसूरत पठान ने अपनी मंज़िल की ओर बढ़ने का हौसला बरक़रार रखा। १९६५ में आयी फ़िल्म `आरज़ू' में बतौर सहनायक उन्होंने अपने अभिनय का लोहा मनवाया। अपने प्रेम का बलिदान करनेवाले एक प्रेमी और सच्चे दोस्त की उनकी यह भूमिका आज भी यादगार मानी जाती है। इसी तरह `सफ़र' और `दयावान' जैसी फ़िल्मों का सहनायक फ़िरोज ख़ान अपने अभिनय से नायक को टक्कर देता नज़र आया। १९६९ में फ़िल्म `आदमी और इंसान' के लिए फ़िरोज को उनका पहला फ़िल्मफेयर अवार्ड मिला, लेकिन बॉलीवुड पर फ़िरोज खान का अंदाज उस वक़्त भारी साबित हो गया जब १९७० के दशक में उन्होंने बतौर निर्माता, निर्देशक और नायक अपनी फ़िल्म `धर्मात्मा' की शूटिंग अफ़ग़ानिस्तान में की। १९८० में आयी `क़ुरबानी' से एक बार फिर फ़िरोज ख़ान ने बॉलीवुड में अपनी धाक और फ़िल्म निर्माण में अपने हुनर का प्रमाण दिया। उनकी इस खूबसूरत रचना का जादू आज भी हिंदी सिने प्रेमियों के दिलोदिमाग पर बरक़रार है और अब `क़ुरबानी' की रीमेक भी बनायी जा रही है। खैर फ़िल्मों और अपनी निजी ज़िंदगी में भी फ़िरोज खान अपनी ज़िंदादिली के लिए जाने जाते थे। वह खुद को किसी अरब शेख से कम नहीं समझते थे और अपनी उसी सोच का प्रमाण वह अपनी फ़िल्मों में देते रहे। शानदार मकान, उनके एक इशारे पर मर मिटनेवाले सहयोगियों की, फ़ौज या फिर जिंदा शेरों को पालतू बनाने का, किसी भी विलासी और रुतबेदार शेख के ये अंदाज़ फ़िरोज खान के हालिया निभाये किरदारों में साफ झलकता था। उम्र के ७०वें साल में भी फ़िरोज खान का दिल जवान था। उन्होंने २००७ में आयी फ़िल्म `वेलकम' में पहली बार कॉमेडी के ज़रिये लोगों तक पहुंचने की कोशिश की। अपने पूरे फ़िल्मी कॅरियर में कभी भी कॉमेडी न करनेवाले फ़िरोज ने इस उम्र में कुछ नया करने का फैसला लिया। `हम अभी ज़िंदा हैं....' लोगों के दिलोदिमाग तक उनके ये शब्द गूंज ही रहे थे कि २६ अप्रैल, २००९ को फ़िरोज ख़ान की आवाज़ सदा के लिए कहीं खो गयी।
फ़िरोज ख़ान की मौत के साथ ही उनका शाही अंदाज़ भी हिंदी फ़िल्म परदे से गायब हो गया। अपनी भूमिकाओं की विविधता के लिए उन्हें हमेशा याद किया जायेगा। खोटे सिक्के का वह काऊबॉय या टारजन या फिर, जांनशीं का अड़ियल कारोबारी सबा करीम, फ़िरोज ख़ान के ये सारे किरदार खुद में खास थे और शायद उनके इसी अंदाज़ पर मर मिटनेवालों ने ही उन्हें हिंदी फ़िल्म जगत में `स्टाइल-आइकॉन का दर्जा दे दिया था।

 

 

बकवास फिल्म है `अलादीन'

 


इस हफ्ते सुजॉय घोष के निर्देशन में बनी अमिताभ बच्चन अभिनीत फ़िल्म `अलादीन' प्रदर्शित हुई। फ़िल्म में अभिनेता रितेश देशमुख अलादीन चटर्जी के किरदार में हैं, जो स्पॉइडरमैन के पेटर पार्कर की तरह लगते है। अलादीन (रितेश देशमुख) अपनी सहपाठी जैसमीन (जैकलीन फर्नांडेज) को पसंद करता है। अलादीन अपनी ज़िंदगी से परेशान रहता है। एक दिन उसे एक जादुई चिराग़ मिल जाता है। एकदम आधुनिक तरीके से उसमें से निकलनेवाले जिन्न से वह बातें करता है। फ़िल्म में अमिताभ बच्चन जिन्न के किरदार में हैं। अलादीन जिन्न का उपयोग अपनी तीन इच्छाओं को पूरा करने में करता है। पहली जैसमीन को प्राप्त करने की इच्छा, दूसरी रिंग मास्टर से छुटकारा पाना। फ़िल्म में

 

 

 

अभिनेता संजय दत्त रिंग मास्टर के रूप में हैं। घोष की इस अलादीन में एक काल्पनिक शहर को यथार्थ और कल्पना के मिश्रण से बनाया गया है, जिसमें अलादीन बचपन से ही अपने आप से बातें करता है और प्रतिभाशाली किताबें पढ़ता है। फ़िल्म के कई दृश्य किसी हास्य की तरह लगते हैं, फ़िल्म में जिन्न की जादूगरी एकदम उबाऊ लगती है। फ़िल्म में अलादीन के माता-पिता की मौत कुछ अजीब तरीके से होती है। अलादीन और जिन्न के बीच की बातें `कोई मिल गया' के जादू से बातचीत की तरह लगती है। फ़िल्म में रिंग मास्टर का किरदार भी समझ के परे लगता है। ये सब देखने के बाद आपको ऐसा लगेगा जैसे घोष ने किसी डिज्नी की एनीमेटेड फ़िल्म बनायी हो। फ़िल्म में रितेश आत्मविश्वासी लगे और उन्होंने अपने किरदार से न्याय किया है। फ़िल्म में रितेश की हीरोइन बनीं जैकलीन फर्नांडेज के खूबसूरत शरीर और खूबसूरत त्वचा को छोड़ दें, तो अभिनय औसत ठीक ठाक है। जिन्न का किरदार निभा रहे शहंशाह अमिताभ बच्चन का किरदार बच्चों को शायद पसंद आ जाये। फ़िल्म में बिग बी के संवादों में दम नहीं है। फ़िल्म का शोरमय का संगीत आर डी बर्मन के संगीत की नक़ल लगता है। अलादीन, जिन्न और रिंग मास्टर का नृत्य ८० के दशक के कलाकारों के नृत्य की कल्पना करने को मज़बूर करता है। फ़िल्म में यथार्थ और जादुई कल्पना दोनों का अभाव है। फ़िल्म बच्चों और बड़ों दोनों की अपेक्षाओं पर खरी नजर नहीं आती।  

 

लोढ़ा ने लगाया जीत का शानदार चौका

 


मुंबई : मुंबई में मंगल प्रभात लोढ़ा ने जीत का रिकॉर्ड कायम किया है। इस शानदार जीत से भारतीय जनता पार्टी में भी लोढ़ा का वजूद बढ़ा है। मलबार हिल विधानसभा क्षेत्र में लोढ़ा ने भाजपा की हारी हुई बाज़ी को जीत में बदल कर एक कुशल चुनाव संयोजक की अपनी छवि को और मज़बूत किया है। राजस्थान के लोकप्रिय नेता जस्टिस गुमानमल लोढ़ा के पुत्र मंगल प्रभात लोढ़ा ने कांग्रेस प्रत्याशी को क़रीब २५ हज़ार वोटों से हराकर मलबार हिल से लगातार चौथी बार जीत हासिल की है। राजनीतिक विश्लेषकों की राय में इस बार मलबार हिल में भाजपा की हार तय थी, लेकिन अपनी मज़बूत रणनीति और कुशल चुनावी संयोजन की वजह से लोढ़ा कांग्रेसी प्रत्याशी पर भारी साबित हुए। विधायक लोढ़ा ने कहा कि इस जीत ने काम करने के उनके उत्साह को और बढ़ा दिया है। अपनी इस जीत के लिए लोढ़ा ने मलबार हिल की जनता का आभार व्यक्त किया हे।
इस चुनाव के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा के भीतर मंगल प्रभात लोढ़ा का कद बढ़ने की सबसे बड़ी वजह यह है कि मुंबई में उपनगरीय क्षेत्र को छोड़कर शहरी इलाके में लोढ़ा अकेले विधायक हैं, जिन्होंने जीत हासिल करके भाजपा-शिवसेना की लाज बचायी है। मुंबई के शहरी इलाकों में लोढ़ा के अलावा भाजपा-शिवसेना का कोई भी उम्मीदवार जीत नहीं पाया। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि लोढ़ा इस बार विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी सीट निकालने में कामयाब रहे हैं।
अपने पिता स्वर्गीय गुमानमल लोढ़ा के नक्शे क़दम पर चलते हुए विधायक लोढ़ा ने मुंबई में एक मज़बूत नेता की छवि कायम की है। मुंबई की डेढ़ करोड़ आबादी में क़रीब २५ लाख से ज़्यादा प्रवासी राजस्थानी हैं। यहां के कुल ३६ विधायकों में लोढ़ा अकेले राजस्थानी विधायक हैं। समाज की राजनीतिक डोर अब पूरी तरह से मंगल प्रभात लोढ़ा के हाथ में है। लोढ़ा ने कहा कि सामाजिक ज़िम्मेदारियां वे पहले भी पूरी निष्ठा के साथ निभाते रहे हैं ओर आगे भी समाज की आशाओं पर खरे उतरेंगे।

 

 

 

प्रीती का आइटम नंबर...

 


 

भई आइटम नंबर का जादू है ही ऐसा कि बॉलीवुड का कितना भी बड़ा कलाकार क्यों न हो उस पर चल ही जाता है। अमिताभ, शाहरुख, संजय दत्त, करीना, ऐश्वर्या, कैटरीना - ये सारे नाम किसी-न-किसी आइटम नंबर के साथ जुड़ चुके हैं। और अब प्रीती जिंटा भी आइटम नंबर के साथ सामने आ रही हैं। सलमान-करीना अभिनीत फ़िल्म `मैं और मिसेज खन्ना' में प्रीती ने बिल्कुल ऐश्वर्या राय के `कजरारे' स्टाइल में ठुमके लगाये हैं। लेकिन प्रीती का कहना है कि न तो उन्होंने किसी को कॉपी किया है और न ही यह एक आइटम नंबर है। प्रीती जब शाहरुख और अमिताभ ने आइटम नंबर की बात नहीं छुपायी तो आप क्यों इस बात को बताने से झिझक रही हैं।




नयी खलनायिका

 

 


 

लगता है कैटरीना कैफ बॉलीवुड की सबसे चहेती एक्ट्रेस बनने के बाद अब अपनी लोकप्रियता कुछ और बढ़ाना चाहती हैं और इसके लिए वह अपनी छवि से हटकर रोल करने को तैयार हैं। सुनने में आया है कि कैटरीना एक फ़िल्म में खलनायिका बनना चाहती हैं और इस फ़िल्म की निर्माता भी खुद वही होंगी। वैसे खास बात यह है कि उनका यह रोल फ़िल्म `एतराज' की प्रियंका चोपड़ा जैसा ही है। प्रियंका ने उस रोल के लिए काफी तारीफें बटोरीं थीं अब देखना यह है कि कैटरीना खलनायिकी का कौनसा नया अंदाज़ पेश करती हैं।

 

हमरा माटी में दम बा की शूटिंग शुरू

 

 मातृभूमि के प्रति समर्पित आदशों की कहानी और उच्च निर्देशन में बन रही फ़िल्म `हमरा माटी में दम बा' एक रोमांटिक संगीतमय फ़िल्म है, जिसका निर्माण रितू प्रभा प्रोडक्शन ने शुरू किया है। निर्देशक सुमित रंजन तथा निर्मात्री रितू जौहरी रंजन हैं। इसे संगीत से सजाया है शशिकांत शर्मा ने और गीत लिखे हैं विनय बिहारी तथा अशोक सिन्हा ने। कैमरा मैन रवि चंदन, नृत्य निर्देशक जगन्नाथ दास तथा राशि जौहरी एक्शन मास्टर आरपी यादव और कार्यकारी निर्माता महेश उपाध्याय हैं। फ़िल्म की शूटिंग शुरू हो गयी है।
`हमरा माटी में दम बा' के हीरो प्रख्यात


अंतिम अद्यतन ( मंगलवार, 08 दिसम्बर 2009 16:31 )
 


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